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________________ ज्ञान अध्ययन ७४७ प. से किं तं उवसमे? उ. उवसमे मोहणिज्जस्स कम्मस्स उवसमेणं, से तं उवसमे। प. से किं तं उवसमनिष्फण्णे? उ. उवसमनिष्फण्णे अणेगविहे पण्णत्ते,तं जहा उवसंतकोहे जाव उवसंतलोभे, उवसंतपेज्जे, उवसंतदोसे, उवसंत दंसणमोहणिज्जे, उवसंतचरित्तमोहणिज्जे,उवसंतमोहणिज्जे, उवसमिया सम्मत्तलद्धी, उवसमिया चरित्तलद्धी उवसंतकसायछउमत्थवीयरागे। से तं उवसमनिष्फण्णे। सेतं उवसमिए। -अणु.सु.२३९-२४१ ३. खइए भावेप. से किं तं खइए? उ. खइए दुविहे पण्णत्ते,तं जहा १.खए य,२.खयनिष्फण्णे य। प. से किं तं खए? उ. खए अट्ठण्हं कम्मपगडीणं खएणं से तंखए। प्र. उपशम क्या है? उ. मोहनीयकर्म के उपशम से होने वाले भाव को औपशमिक भाव कहते हैं। प्र. उपशमनिष्यन्न क्या है? उ. उपशमनिष्पन्न (औपशमिक भाव) के अनेक प्रकार कहे गए हैं, यथाउपशांतक्रोध यावत् उपशांतलोभ, उपशांतराग, उपशांतद्वेष, उपशांतदर्शनमोहनीय, उपशांतचारित्रमोहनीय, उपशांतमोहनीय, औपशमिक सम्यक्त्वलब्धि, औपशमिक चारित्रलब्धि, उपशांतकषाय छद्मस्थवीतराग आदि, यह उपशमनिष्पन्न औपशमिकभाव है। यह औपशमिकभाव का स्वरूप है। ३. क्षायिक भावप्र. क्षायिकभाव क्या है? उ. क्षायिकभाव दो प्रकार का कहा गया है, यथा १. क्षय, २. क्षयनिष्पन्न। प्र. क्षय (क्षायिकभाव) क्या है? उ. आठ कर्मप्रकृतियों के क्षय से होने वाला भाव क्षायिक भाव है। प्र. क्षयनिष्पन्न (क्षायिकभाव) क्या है? उ. क्षयनिष्पन्न अनेक प्रकार के कहे गये है, यथा उत्पन्नज्ञान दर्शनधारक अर्हत् जिन केवली, क्षीणआभिनिबोधिकज्ञानावरण वाला, क्षीणश्रुतज्ञानावरण वाला, क्षीणअवधिज्ञानावरण वाला, क्षीणमनःपर्यवज्ञानावरण वाला, क्षीणकेवलज्ञानावरण वाला, अविद्यमान आवरण वाला, निरावरण वाला, क्षीणावरण वाला, ज्ञानावरणीयकर्मविप्रमुक्त। केवलदर्शी, सर्वदर्शी, क्षीणनिद्रा, क्षीणनिद्रानिद्रा, क्षीणप्रचला, क्षीणप्रचलाप्रचला, क्षीणस्त्यानगृद्ध, क्षीणचक्षुदर्शनावरण वाला, क्षीणअचक्षुदर्शनावरण वाला, क्षीणअवधिदर्शनावरण वाला, क्षीणकेवलदर्शनावरण वाला, अनावरण निरावरण, क्षीणावरण, दर्शनावरणीयकर्मविप्रमुक्त क्षीणसातावेदनीय, क्षीणअसातावेदनीय, अवेदन, निर्वेदन, क्षीणवेदन, शुभाशुभ-वेदनीयकर्मविप्रमुक्त, प. से किं तं खयनिष्फण्णे? उ. खयनिष्फण्णे अणेगविहे पण्णत्ते,तं जहा उप्पण्णणाणदसणधरे-अरहा जिणे केवली। खीणआभिणिबोहियणाणावरणे, खीणसुयणाणावरणे, खीणओहिणाणावरणे,खीणमणपज्जवणाणावरणे, खीणकेवलणाणावरणे,अणावरणे,णिरावरणे, खीणावरणे, णाणावरणिज्जकम्मविप्पमुक्के, केवलदंसी सव्वदंसी खीणनिद्दे खीणनिद्दानिद्दे खीणपयले खीणपयलापयले खीणथीणगिद्धे खीणचक्खुदसणावरणे,खीणअचक्खुदंसणावरणे, खीणओहिदसणावरणे,खीणकेवलदसणावरणे, अणावरणे, निरावरणे,खीणावरणे दरिसणावरणिज्जकम्मविप्पमुक्के, . खीणसायवेयणिज्जे, खीणअसायवेयणिज्जे, अवेयणे निव्वेयणे खीणवेयणे सुभाऽसुभवेयणिज्जकम्मविप्पमुक्के, खीणकोहे जाव खीणलोभे,खीणपेज्जे खीणदोसे खीणदसणमोहणिज्जे खीणचरित्तमोहणिज्जे अमोहे निम्मोहे खीणमोहे मोहणिज्जकम्मविप्पमुक्के, खीणणेरइयाउए, खीणतिरिक्खजोणियाउए, खीणमणुस्साउए, खीणदेवाउए अणाउए निराउए खीणाउए आउयकम्मविष्पमुक्के, गइ-जाइ सरीरंगोवंग बंधण संघात संघयण अणेगबोंदिविंदसंघायविप्पमुक्के, क्षीणक्रोध यावत् क्षीणलोभ, क्षीणराग, क्षीणद्वेष, क्षीणदर्शनमोहनीय, क्षीणचारित्रमोहनीय, अमोह, निर्मोह, क्षीणमोह, मोहनीयकर्मविप्रमुक्त, क्षीणनरकायुष्क, क्षीणतिर्यञ्चयोनिकायुष्क, क्षीणमनुष्यायुष्क, क्षीणदेवायुष्क, अनायुष्क, निरायुष्क, क्षीणायुष्क, आयुकर्मविप्रमुक्त, गति-जाति-शरीर-अंगोपांग-बंधन-संघात-संहनन-अनेकशरीर वृन्द, संघात से विप्रमुक्त,
SR No.090158
Book TitleDravyanuyoga Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj & Others
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year1994
Total Pages910
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size32 MB
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