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________________ जीवाधिकार जोव सम्बन्धो नो अधिकार जीवो उपओगमओ अमुत्ति कसा सवेहपरिमाणो । भोत्ता संसारस्थो सिद्धो सो विस्ससोडगई ॥२॥ अम्बयार्य ( सो) वह ( जोव) ( जोवी ) जोने वाला। ( उवओगमओ) उपयोगमयो । ( अमत्ति) अमर्तिक । ( कत्ता) की। ( सदेहपरिमाणो) शरीरप्रमाण । ( भोत्ता ) कर्मों के फल का मोक्ता। (संसारत्यो ) संसार में स्थित । ( सिद्धो ) सिद्ध ।। विस्ससा) स्वभाव से । (उड्ढगई ) ऊर्ध्वगमन करने वाला है। वह जीव प्राणों से युक्त है। जानने-देखने वाला होने से उपयोगमयी अमूर्तिक-कर्ता, शरोर प्रमाण, भोक्ता, संसारी, सिख और स्वभाव से ऊर्ध्वगमन स्वभाव वाला है। प्र०-जीव का वर्णन कितने अधिकारों में किया गया है। ३०-जीव का वर्णन नो अधिकारों में किया गया है। प्र०-जीव के नौ अधिकारों के नाम बताइये? २०-१-जीवस्व अधिकार, २-उपयोग अधिकार, ३-अमूर्तिक अधिकार, ४-कर्तृत्व अधिकार, ५-स्वदेहपरिमाण अधिकार, ६-भोक्तृत्व अधिकार, ७-संसारित्व अधिकार, ८-सिद्ध स्व अधिकार, ९-ऊध्र्वगमन अधिकार। जीव का लाण तिषकाले अदुपाणा इखियबलमाउ आणपाणो य । बबहारा सो जीवो गिज्ययगयदोषणा जस्स ॥३॥ अम्बयार्थ' (ववहारा ) व्यवहार नय से। (जस्स) जिसके । (तिस्काले) सीनों कालों में। (इन्द्रियबलमाउ ) इन्द्रिय, बल, आयु । ( आणपामो म) -
SR No.090157
Book TitleDravyasangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size1 MB
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