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________________ ॥ श्री नेमिनाथाय नमः।। श्रीमन्नेभिचन्द्रसिद्धान्नचालवर्ती विरचित द्रव्य संग्रह प्रथमोऽधिकारः मंगलाचरण जीवमजीवं दवं जिणवरवसहेग जेण णिद्दिट्ट। देविषिव व ते सम्बदा सिरसा ॥१॥ बन्षयार्ष (ण } जिन | ( जिणवरवसहेण ) जिनवर वृषभ ने । (जीवम जीव) जीव और अजीव । ( दम्यं ) द्रव्य । ( णिष्टि) कहे हैं । ( देविदविदवद) देवों के समूह से वन्दनीय । (तं) उनको। (जिमवर वृषम को) (सव्वदा ) हमेशा। (सिरसा ) मस्तक नवाकर। ( वंदे ) नमस्कार करता हूँ। जिन वृषभनाष मगवान ने जीव और अजीव द्रव्यों का निरूपण किया वा उनको मैं ( नेभिचन्द्र सिद्धान्तिदेव ) सदा मस्तक झुका कर नमस्कार करता हूँ। प्र०मंगलाचरण में किसे नमस्कार किया है? उ-वृषभवेव को या समस्त तीर्थकरों को, समस्त प्राप्तों को। प्र०-वृषभदेव कौन थे? उ.-इस युग के प्रथम तीर्थफर थे। प्र०-जिनवर किसे कहते हैं। उल-जिन कहते हैं बर्हन्त देव, केवली भगवान को सपा तीर्थकर कैवलो को जिनवर कहते हैं। प्रक-प्रम्य कितने हैं? -प्रम्य दो है-१-जीव द्रव्य, २-अजीव रम्य ।
SR No.090157
Book TitleDravyasangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size1 MB
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