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________________ परोक्ष १. मतिज्ञान २. श्रुतज्ञान ३. कुमतिज्ञान ४. कुश्रुतज्ञान ५. अवधिज्ञान ज्ञानोपयोग ८ ६. कुअवधि ७. मन:पर्ययज्ञान ८. केवलज्ञान अम्वयार्य विकल मण्य संग्रह उपयोग प्रत्यक्ष सकल दर्शनोपयोग x १. चक्षुदर्शन २. अचक्षुदर्शन ३. अवधिदर्शन ४. केवलदर्शन नयापेक्षा जीव का लक्षण अटुचनाणवंसण सामण्णं जोवलक्क्षणं भणियं । ववहारा सुणया सुद्धं पुण हंसर्ग जानं ॥ ६ ॥ (ववहारा) व्यवहारनय से ( अटुचदुणाणदंसणं ) आठ प्रकार का ज्ञान और चार प्रकार का दर्शन ( सामण्णं ) सामान्य से । ( जीव-मा) जोव का क्षण ( भणियं ) कहा गया है। (पुन) और । ( सुराणा ) शुद्ध निश्चयनय से (सुख) शुद्ध । ( दंसणं ) दर्शन । (माणं ) ज्ञान ( जीवलपवणं भणियं ) जीव का लक्षण कहा गया है। व्यवहारनय से आठ प्रकार का ज्ञान बोर चार प्रकार का दर्शन - सामान्य से जोब का लक्षण कहा गया है और शुद्ध निश्चयतय से शुद्ध दर्शन और ज्ञान जोव का लक्षण कहा गया है।
SR No.090157
Book TitleDravyasangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size1 MB
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