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________________ देश में सिवाय चाण्डाल के कोई अधिवासी न जीवहिंसा करता है, न मद्य पीता है और न लहसुन खाता है।.... न कहीं सूनागार और मद्य की दुकानें है। . उसके इस कथन से भी जैन मान्यता का समर्थन होता है कि भद्दलपुर, उज्जैनी आदि मध्यप्रदेशवर्ती नगरों में दिगम्बर जैन मुनियों के संघ मौजद थे और उनके द्वारा अहिंसा धर्म की उन्नति होती थी। फाह्यान संकाश्य, श्रावस्ती, राजगृह आदि नगरों में भी निग्रंथ साधुओं का अस्तित्त्व प्रगट करता है। संकाश्य उस समय जैन तीर्थ माना जाता था। संभवतः यहू भगवान् विमलनाथ तीर्थंकर का केवल्यज्ञान का स्थान है। दो-तीन वर्ष हुये, वहीं निकट से एक नग्न जैन मूर्ति निकली थी और वह गुप्त काल की अनुमान की गई है। इस तीर्थ के सम्बन्ध में निग्रंथों और बौद्ध भिक्षुओं में वाद हुआ वह लिखता श्रावस्ती में भी बौद्धों ने निर्ग्रथों से विवाद किया वह बताता है। श्रावस्ती में उस समय सुहृदध्वज वंश के जैन राजा राज्य करते थे। 'कुहाऊं (गोरखपुर) से जो स्कन्दगुप्त के राजकाल का जैन लेख मिला है उससे स्पष्ट हैं कि इस ओर अवश्य हो दिगम्बर जैन धर्म उन्नतावस्था पर था। साँची से एक जैन लेख विक्रम सं. ४६८ भाद्रपद चतुर्थी का मिला है। उसमें लिखा है कि उन्दान के पुत्र आपरकार देव ने ईश्वरवासक गाँव और २५ दीनारों का दान किया। यह दान काकनावोट के जैन बिहार में पाँच जैन भिक्षुओं के भोजन के लिये और रत्नगृह में दीपक जलाने के लिये दिया गया था। उक्त आमस्कारक देव चन्द्रगुप्त के यहाँ किसी सैनिक पद पर नियुक्त था । " यह भी जैनोत्कर्ष का द्योतक है। राजगृह पर भी फाह्यान निग्रंथों का उल्लेख करता है । वहाँ की सुभद्र गुफा में तीसरी या चौथी शताब्दि का एक लेख मिला है जिससे प्रकट है कि पुनि संघ ने पुनि वैरदेव को आचार्य पद पर नियुक्त किया था। राजगृह में गुप्त काल की अनेक दिगम्बर मूर्तियाँ भी हैं। १० १. फाह्यान, पृ. ३१ २. IBQ, Vol. V.p.142. ३. फाह्यान, पृ. ३५-३६॥ ४. फाह्यान, पृ. ४०-४५ ५. संत्रास्मा, पृ. ६५ । ६. भागास, भा. २, पृ. २८९ । १७. भाप्रारा. भा. २, पृ. २६३ । 4. Here also the Nigantha made a pit with fire in it and poisoned the food of which the invited Buddha to patake (The Nirgranthas were ascetics who went naked" Fa-llian. Beal.pp.110–113 यह उल्लेख साम्प्रदायिक द्वेष का द्योतक है। ९. बंबिओ जैसमा, पृ. १६ । १०. "Report on the Ancient Jain Remains on the hills of Rajgir" submitted to he Patna Court by R. B. Ramprasad Chanda B.A.Ch. IV..p.30 (Jain images of the Gupta & Pala period at Rajgir). दिसम्बर और दिसम्बर मुनि (85)
SR No.090155
Book TitleDigambaratva Aur Digambar Muni
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamtaprasad Jain
PublisherDigambar Jain Sarvoday Tirth
Publication Year
Total Pages195
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Principle
File Size4 MB
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