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________________ ८८ j दि० जैन व्रतोद्यापन संग्रह | फनसचोच सदा फलाम्रकपित्थदाडिम माधवी । वीजपूर पवित्रचिर्भटमूगलकुच सुकर्कटः ॥ नमामि षोडश । फलं ॥ ८ ॥ जलेन गन्धेन शुभाक्षतेन पुष्पेण हव्येन सुदीपकेन । फलेन धूपेन व्रत सुखाप्त्य श्रीभूषणानां परिपूजयामि ॥ ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्धयादिषोडशकारणेभ्यो अर्धं । अथ जयमाला । सुगुणभण्डारं विगतविकार, संसाराणव भयहरणं । कलिमलनाशण सुमइपयासणं, पंचमगइमय सुहकरणं ॥ १ ॥ इह षोडशभावण परम तत्त, इह परभवगमण सहाय सत्त । इह तित्थेसर पद दाण सार, इह तारह रवि संसार पार || २ || इह भावणदोविभोग होइ, इह भावणदो सेवेसु लोय । इह भावणदो विहडे कुम्भ, इह भावणदो मह होइ धम्म, ॥ ३ ॥ इह भाव, इंदर पदवी सहाय, इह भावणदो सीय रिसिय राय । इह भावणदो होउ सफल जम्म, इह भावणदो सवि पुण्य कम्म || ४ || इह भावण अम्मजरा विणास, ss भावण शिवपद धरइ पास । इह भावण कम्मकलङ्क दूर इह भावण सुहसम्पति पूर ॥ ५ ॥ इह भावण भवतारण सुणाव, इह भावणदो वद अमरगाव । इह भावणदो कुलदोसनास, इह भावणदो
SR No.090154
Book TitleDigambar Jain Vratoddyapan Sangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorFulchand Surchand Doshi
PublisherDigambar Jain Pustakalay
Publication Year1986
Total Pages408
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, & Ritual
File Size20 MB
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