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________________ admashee --- - दि० ओम प्रतोद्यापन संग्रह । . [ ५३... अनन्त, कुलिक, वासुकी, शंखपाले, तक्षक पद्म, महापन, कर्कोटक, जयविजयादि अष्ट महानागाश्च वः प्रीयंतां २ । __इन्द्र, अग्नि, यम, नैऋत, वरुण, वायु, कुबेर, ईशान, धरणींद्र, चन्द्राश्चेति दशदिक्पालदेवाश्च वः प्रीयंतां २। आदित्य, सोम मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु, नाम नवग्रहाश्च वः प्रीयंतां २ । काल, निकाल, लोहित, कनक, कनकस्थान, अन्तरद, कच, यव, दुदभि, रत्ननिभ, रूप; निर्भास; नीलनीलभास, अश्व; अश्वस्थान, कोश, केशवर्ण, शंख, शंखपरिमाण, शंखवर्ण, उदय, पंचवर्ण, तिल, तलपुच्छ, क्षारराशि, धूम, 'धूमकेतु, एकसस्थान, अज्ञ, कलेवर, वकट, अभिन्नसंधि, ग्रंथिमान, चतुः पाद, विद्युज्जिह्व. नभ, सदृश, निलय, काल, कालकेतु, अनय, सिंहायु, विपुलकाल, महाकाल, रुद्र, सन्तान, सम्भव, सर्वाधीश, शांति वस्तून, निश्चल, प्रलंभ, निमंत्र, ज्योष्मित, स्वयंप्रभ, भासुर, विरज, निदु:ख, वीतशोक, सीमंकर, क्षीमंकर, अभय कर, विजय, वैजयंत, अपराजित, विवाल, तस्त, विजयिष्णु विकस, करिकाष्ठ, एकजटि, अग्निज्वाल, ज्वालकेतु, क्षीररस, अघ श्रवण, राहु, महाग्रह, भावग्रह, कुज, शनि; बुध, शुक्र, गुरवश्चेति. अष्टाशीति, ग्रहाश्च वः प्रीयंतां २। ग्राम, नगर, खेड, खर्वड मडव,पत्तन, द्रोणामुख संवाहन
SR No.090154
Book TitleDigambar Jain Vratoddyapan Sangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorFulchand Surchand Doshi
PublisherDigambar Jain Pustakalay
Publication Year1986
Total Pages408
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, & Ritual
File Size20 MB
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