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________________ ४६ । दि० जैन व्रतोद्यापन संग्रह। अर; निःपाप, निष्कषाय, विपुल, निर्मल, चित्रगुप्त, समाधिगुप्त, स्वयंभू, अनिवर्तिक, जय, विमल, देवपाल, अनन्तवीर्याश्चेति चतुर्विशति अनागतकालतीर्थंकरपरमजिनदेवाश्च वः प्रीयतां २। - ॐ अनाद्यविद्याविलासदुस्तरतमःपटलपटावगुण्ठितजगर्जितज्योतिः स्वरूपयथावस्थितसमस्तवस्तुस्वरूपनिरूपणप्रवीणादिब्रह्मवदनकंजसंजातद्वादशांगचतुर्दशपूर्वप्रपंचप्रवचनपारावारपारीणाः। ॐ वृषभसेन, कुम्भ, दृढरथ, शतधनु, देवशर्म, धनदेव, नन्दन, सोमदत्त, सूरदत्त, वायुशर्म, यशोबाहु, मार्गदेव, अग्नि, अग्निदेव, अग्निगुप्त, चित्राग्नि, हलधर, महिधर, माहेन्द्र, वासुदेव, वसुन्धर, अचल, मेरुधर, मरुभूति, सर्वयश, सर्वयज्ञ सर्वगप्त, सर्वप्रिय, सर्वदेव, सर्वविजय, विजयगुप्त, विजयमित्र, विजयदल, अपराजित, वसुमित्र, विश्वसेन, सुसेन, सत्यदेव, देवसत्य, सत्यगुप्त, सत्यमित्र, शर्मद, विनत, शंवर, मुनिगुप्त, मुनियज्ञ, मुनिदेव, गप्तयज्ञ, मित्रयज्ञ, स्वयंभू, भगदेव, भगदत्त, भगफल्गु, मित्रफल्गु, प्रजापति, सर्वसह, वरुण, धनपाल, मघव, तेजोराशि, महावीर, महारथ, विशाल, महाज्वाल, सुविशाल, वज्र, वज्रशाल; चन्द्र, चन्द्रचूल, मेघेश्वर, कच्छ, महाकच्छ, नाम, विनमि बल, अतिबल, वज्रबल, नंदी, महानुभोगी, नंदिमित्र, महानुभाव, कामदेवानुपमाश्चेति आदिब्रह्म समवशरण प्रवर्तमान चतुरशीतिगणधरदेवाश्च वः प्रीयंतां२ ॥
SR No.090154
Book TitleDigambar Jain Vratoddyapan Sangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorFulchand Surchand Doshi
PublisherDigambar Jain Pustakalay
Publication Year1986
Total Pages408
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, & Ritual
File Size20 MB
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