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________________ पुण्याह वाचनं । [ ४३ चार्योऽपसव्यहस्तेन धृत्वा पुण्याहमंत्रमुच्चारयन् सिंचेत् । ॐ स्वस्तिककलश स्थापनं करोमि । | (पासमें छपे हुए यंत्र अनुसार करीब एक सेर चावल लेकर जमीनपर यंत्र बनावें, फिर उसके ऊपर जलसे भरा हुआ कलश रखकर उसमें नागरवेलका पत्ता रखें और पुण्याहवाचन पढते जावे और कलशका पानी उस पत्तेसे दाहने हाथसे छिडकते जावे ।) अथ पुण्याहमंत्र-ॐ ह्रां ह्रीं ह्र हौं ह्रः नमोऽर्हते भगवते श्रीमते समस्तगंगासिंवादिनदीनदतीर्थजलं भवतु स्वाहा । जलपवित्रीकरणं ॥ अभ्यर्च्य कलशं तोयप्रवाहैश्वदनैः शुभैः । अक्षतैः कुसुमैरनर्दीपधूपफलैरपि ।। ॐ ह्रीं पुण्याहकलशार्चनं करोमि स्वाहा । ( साथीयाके उपरके कलशको अर्घ चढावें।) कलशार्चनं ॥ आर्या- जयतु जिनेश्वरशासनमखिलसुखं मे भवतु जगति जनानां । देशे भवतु सुभिक्षं पांतु चिरं वसुमतिं राज्ञः ॥ ॐ अहद्भयो नमः । ॐ सिद्धेभ्यो नमः । ॐ मूरिभ्यो. नमः । ॐ पाठकेभ्यो नमः । ॐ सर्बसाधुभ्यो नमः। __ॐ अतीतानागतवर्तमानत्रिकालगोचरानन्तद्रव्यगुणपर्यायात्मकवस्तुपरिच्छेदकसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राद्यनेकगुणगणाधारपंचपरमेटियो नमो नमः । ॐ पुण्याहं. ३ प्रीयंतां३
SR No.090154
Book TitleDigambar Jain Vratoddyapan Sangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorFulchand Surchand Doshi
PublisherDigambar Jain Pustakalay
Publication Year1986
Total Pages408
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, & Ritual
File Size20 MB
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