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________________ दि० जैन व्रतोद्यापन संग्रह | अथ अङ्गन्यास भेदः । तथा वामप्रदेशिन्यां न्यस्य पंच नमस्कृतिं । पूर्वादिदिक्षु रक्षार्थं दशस्वपि निवेशयेत् || ६ || असि आउ सा एतानि पंचाक्षराणि तर्जन्यंगुल्यां संस्थाप्य कूटबीजानि । ( ऊपरके पांच बीजाक्षर दक्षिण हाथकी तर्जनी अंगुली ऊपर लिख नीचे लिखे दश मंत्र बोल नीचे दिशाओं में हाथ दिखाना चाहिये ) | मंत्रमें बताई हाँ पूर्वे । ईं ह्रीं क्षीं अग्नौ । ॠ हैं क्षौं नैऋते । एँ हैं झैं वरुणे ओं हों क्षौं कुबेरे । ओं हं ईशाने । अ: हों क्षीं आकाशे । दिशा बंधनं । ४० ] * ह्रक्षू यमे । । ऐं हों क्षों वायव्ये । अंहः क्षः भूतले । वर्मितोऽनेन मंत्रेण सकलीकरणे सुधीः । कुर्वनष्टानि कर्माणि केनाप्येनानि विन्यसेत् ॥ ७ ॥ ॐ नमोऽर्हते सर्व रक्ष २ हृ फट् स्वाहा | अनेन पुष्पाक्षतं सप्त वारान् प्रजाप्य परिचारकाणां शीर्षेषु क्षिपेत् । ( ऊपरका मंत्र सात वक्त बोल सात वक्त पुष्प अक्षत साथ परिचारकों के मस्तक उपर क्षेपना । ) ॐ ह्र फट् किरीट घातय २ परविघ्नान् स्फोटय २ सहस्र खंडान् कुरु २ परमुद्रांछिद २ परमंत्रान् भिद २ क्षः फट् स्वाहा । ( ऊपरका “ ॐ ह्रीं फट् " ए मंत्र बोल पुष्पाक्षत दश दिशानों में सर्व विघ्नोंकी शांतिके लिए क्षेपण करना । ) ॥ इति सकलीप्रकरण विधानम् ॥
SR No.090154
Book TitleDigambar Jain Vratoddyapan Sangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorFulchand Surchand Doshi
PublisherDigambar Jain Pustakalay
Publication Year1986
Total Pages408
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, & Ritual
File Size20 MB
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