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________________ दि० जैन व्रतोद्यापन संग्रह। अथ करन्यासः । हृदि न्यसेन्नमस्कारमों हां पूर्वक महतां । पूर्वे शिरसि सिद्धानामों ही पूर्वां नमस्कृति ॥१॥ ॐ हूँ पूर्वकमाचार्यस्तोत्रं शीर्षस्य दक्षिणे । ॐ ह्रौं पूर्वमुपाध्यायस्तवं पश्चिमदेशतः ॥ २ ॥ ॐ इः पूर्वा ततो वामे सर्वसाधुनमस्कृति । न्यसेत्पंचाग्यमन्मंत्रान् शिरस्येवं पुनः सुधीः ॥३॥ ॐ ह्रां णमो अरहताणं स्वाहा हृदये। ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं स्वाहा ललाटे । ॐ ह्र. णमो आइरियाणं स्वाहा शिरसो' दक्षिणे। ॐ ह्रीं णमो उवझ्झायाणं स्वाहापश्चिमे। ॐ हा णमो लोए सव्वसाहूणं स्वाहा" वामे । पुनस्तानिमान् मंत्रान् प्राग्भागे दक्षिणे पश्चिमे उत्तरे च क्रमेण विन्यसेत् ।। इति प्रथमांगन्यासः ।। प्राग्भागे शिरसो मध्ये दक्षिण पश्चिमे तथा। वामे चैतेषु विन्यासक्रमो वारे द्वितीयके ॥४॥ ॐ ह्रां णमो अरहंताणं स्वाहा शिर-मध्ये । ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं स्वाहा ललाटे । ॐ ह्र आइरियाणं स्वाहा शिरसो १ सकलीकरण करते समय हाथ जोड़, बुड़े हायसे हृदय, कपाल, माथा, पश्चिम आदि जो शरीरके अवयवोंके नाम बाकें वहां वहां हाथ लगाना ।
SR No.090154
Book TitleDigambar Jain Vratoddyapan Sangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorFulchand Surchand Doshi
PublisherDigambar Jain Pustakalay
Publication Year1986
Total Pages408
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, & Ritual
File Size20 MB
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