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________________ श्रीमदाशाघरकृतः महाभिषेक : प्रद्मप्रमाऽनाहतयंत्रम् । ल 31 ॠ அ :12 [ ३७ उई उपरके दोनों यंत्रोंको सकलीकरण करनेवाला एकको दाहिने और एकको वाम हाथमें लिखे । यदि ऐसा न करे तो पान पर लिखकर पानोंको दोनों हाथोंमें रख लें । हस्तद्वयकनी यस्याद्यंगुलीनां यथाक्रमं । मूलरेखात्रयस्योर्ध्वमग्रे च युगपत्सुधीः ॥ न्यसोंहामादि होमाढ्यान् नमस्कारान् करौ मिथः । संयोज्यांगुष्टयुग्मेन व्यस्तान् स्वांगेषु विन्यसेत् ॥ ॐ ह्रीं अहं वं मं हं सं तं पं असि आउ सा हस्त संघटनं करोमि स्वाहा । हस्त संघटनं ॥ ऊपरके दोनों यंत्रोंसे उल्लिखित हाथोंकी पांचों अंगुलियां लम्बी कर दाहिने हाथकी पांच अंगुलियों ऊपर अंगुलियोंके मूल में अगूठा अनुक्रमसे । ॐ ह्रां णमो अरहंताणं स्वाहा, ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं स्वाहा, ॐ णमो हूँ आइरियाणं स्वाहा, ॐ ह्रौं णमो उवझ्झायाणं स्वाहा, ॐ ह्रः णमो लोए सव्वसाहूणं स्वाहा । ( इस प्रमाण णमोकार मंत्र लिख हाथ जोड़ना । इति सकलीकरणम् ।
SR No.090154
Book TitleDigambar Jain Vratoddyapan Sangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorFulchand Surchand Doshi
PublisherDigambar Jain Pustakalay
Publication Year1986
Total Pages408
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, & Ritual
File Size20 MB
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