SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 348
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ दि० जैन व्रतोद्यापन संग्रह | [ ३४१ ॐ ह्रीं व्रतसमितिगुप्ति युक्तेभ्यः कषायादिरिपुजेतृम्यः पाठकेभ्यो जलं गन्ध ं अक्षत पुष्प नैवेद्य दीप धूपं फलं अर्घ्यं च निर्वपामीति स्वाहा । सामादैः स्वच्छतोरूपहिततुहिनौ चन्द्रनैः स्वर्गलक्ष्मीलीलारक्षतौ पॅर्मिल दलिकुसुमै रुद्रमैर्नित्यहृद्यः । नैवेद्य र्नव्य जावूनदमददमकेंदपकैः काम्यधूमस्तूपधूपैर्मनोट हसुरभिफलैः पूजयेपाठकेन्द्रान् । ॐ ह्रीं पंचविंशतिमूलगुणधार केभ्यः पाठकेभ्योऽध्यं निर्वपामीति स्वाहा । यस्यार्थ शान्तिधारा । पुष्पांजलिः । - सर्वज्ञोपज्ञविद्याहृदय परिचय प्रोच्छलनिर्विकल्प - प्रत्यग्ज्योतिः प्रतिष्ठान् परदुरधिगमद्य ुद्गमोद्धारनिष्ठान् । अन्योन्यस्पर्द्ध मानत्रिदिव शिवपद श्रीकटाक्षच्छटाढ्यान चिन्मूर्ति विभ्रतोऽग्रयान - शरणमिह यजे मङ्गलं सर्वसाधुन ॥ ॐ ह्रीं वैश्रसिकपरमचिन्मय विश्वैश्वर्यपदापहारकठोरकर्मठ दुःकर्मशात्रव शक्ति शातनोत्सिक्त विशिष्टशक्ति ब्यञ्जक प्रकाम दुर्लक्ष व्यतिरेक क्षेत्रज्ञाशान्तर प्रवेश दुर्ललित बुद्धयनुबन्ध प्रवर्धमान सद्ध्यानसमिद्ध सहजानन्दामृत रसास्वादनावधीरित परम भुक्ति सम्पत्प्रियासमागमोत्कण्ठानां मङ्गल ठोको
SR No.090154
Book TitleDigambar Jain Vratoddyapan Sangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorFulchand Surchand Doshi
PublisherDigambar Jain Pustakalay
Publication Year1986
Total Pages408
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, & Ritual
File Size20 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy