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________________ दि० जन. प्रतोद्यापन संग्रह। [.२९५ ... - अथ प्रत्येक पूजा। अनुष्टुप् । सुसोमा धरणाधीश, पुत्रं पद्मप्रभं यजे । पद्मचिह्न समायोग्यं कुसुमाभ्यां सुसेवितम् ।। ॐ ह्रीं पद्मप्रभ जिनेन्द्र ! अत्रावतरावतर संवौषट् । ॐ ह्रीं पद्मप्रभ जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । ॐ ह्रीं पद्मप्रभ जिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् । ॐ ह्रीं पद्मप्रभ जिनेन्द्राय जलं गन्धमक्षतं पुष्पं चरुं दीपं धूपं फलमद्यमित्यादि निर्वपामीति स्वाहा । अथ स्तोत्रम् । __ उपजाति । पद्मप्रभः पद्मपलाश लेश्यः, पद्मालया लिङ्गित चारुमूर्तिः । बभौ भवान् भव्य पयोरुहाणां, पद्मकराणा मिव पद्मबन्धुः ॥ बभार पद्मां च सरस्वतीं च, भवान्पुरस्तात्पति मुक्तिलक्ष्म्याः । सरस्वती मेव समग्र शोभां, सर्वज्ञ लक्ष्मी ज्वलितां विमुक्तः ॥ १-पुष्प यक्ष और मनोवेगा यक्षी। २-यह स्तोत्र समन्तभद्राचार्य विरचित स्वयंभूर्तोत्रमें कहा है इस नवग्रह विधानमें आगे छपे हुए अन्य तीथंकरोंके स्तोत्र भी स्वयंभस्तोत्रके ही हैं।
SR No.090154
Book TitleDigambar Jain Vratoddyapan Sangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorFulchand Surchand Doshi
PublisherDigambar Jain Pustakalay
Publication Year1986
Total Pages408
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, & Ritual
File Size20 MB
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