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________________ २६२ ] दि० जैन व्रतोद्यापन संग्रह । आरतिओ कुण्णंता, अट्ठमदीवहिं वासओ भायं । अच्छरय गच्चमाणाः देवाणां जयजय सद्दम् ॥४॥ जय जणाह गुण गहिरमई सायरा । बीयसो यांति जय लोपतु भायरा ॥ कुणइ आरतिओ विग्ध अवहारिणो । सग्ग अपवग्ग मग्गमि जो देसणो ॥५।। गाथा । अट्ठमदीव पहाणो, चउदिसि चत्तारिवावि सुखणाए । जोयण लक्ख पमाणा, व्यमेयं पयं पीयाविरे॥६॥ वावि कुंडभि दह तिणिच्चेहरा । दिसिहि दिसि एव जाणेहि मह्न सुन्दरा ॥ एय एयम्मि वसु अहिंए सउ पडिणय । उद्धसय पञ्च धुणुहाइ तणु वपुमयं ॥७॥ गाथा । अट्टसहस्समाला, णाणा रयण मणीय लम्बमाणाए । पत्तेया पोया, अणाइ णिहिणामय सिद्धा ॥८॥ जोयण सत्तरि पञ्च अहियं परं । उच्चमाणंवि आयाम सहु णिब्भरं ॥ विध्उरा होति पंणास मनोहारिणो । चारिदारं वरं मणोहारिणो ॥९॥ - गाथा । सिंहादार वरम्मिय, धवल मणोहर सोहणाए । आविसराः प्रयण्टा, चत्तारि माण थंभाए ॥१०॥
SR No.090154
Book TitleDigambar Jain Vratoddyapan Sangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorFulchand Surchand Doshi
PublisherDigambar Jain Pustakalay
Publication Year1986
Total Pages408
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, & Ritual
File Size20 MB
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