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________________ २२] दि. जैन प्रतोषालन संग्रह । मन०॥ पूजे तेरसि चारित्र तेर, देव अभिषेक करें तस मेर मन०॥ जे नर चउदशे पूजे अनन्त तेहनि आश पूरे भगवन्त ॥मन०॥ घत्ता । तिथि चउदह जाणो धर्म वखाणो, सहु मन आणो भाव धरी । श्री विजय सुकीर्ति शिष्य सुमूर्ति नारायण जयमाल करी ।। ॐ ह्रीं धर्मकार्यप्रसिद्धचतुर्दशतिथिभ्यो महाघ । तिथयो तिथिभिः सुकृताय कृताः । शुभ कर्म सुखधा जगत्प्रथिताः ।। शुभमर्चकधर्मिजनाय सदा । सु द्विशं विह शं जगति प्रथितं ।। इत्याशीर्वादः । छप्पय । प्रतिपद बीज सु त्रीज समकित धर्म सुदंसण । चौथा पंचमी वर छठि वेद परमेष्ठि द्रवांचण ।। सातिम आठिम नुम संजक्रम यहन नया नव । दशम अग्यारस द्वादशी धर्म अङ्ग तप संभव ।। तेरसे चारित्र पूजिये चउदशे अनन्त जिनसरु । नारायण ब्रह्मचारी कहे, चउदश तिथि मंगल करु ॥ इति चतुर्दश तिथि पूजा समाप्त ।
SR No.090154
Book TitleDigambar Jain Vratoddyapan Sangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorFulchand Surchand Doshi
PublisherDigambar Jain Pustakalay
Publication Year1986
Total Pages408
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, & Ritual
File Size20 MB
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