SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 245
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ २३८ ] दि० जैन व्रतोबापन संग्रह । % E दयादानदाता जगज्जन्तु पाता । महामोहजेता च नेता जिनाना ।। सुमुद्घात भेता चहु कर्महन्ता । जिनो नाभि पुत्रो भवं शं करोतु ॥ इत्याशोवादः । छप्पय । वृषभ जिनेश्वर देव देव करे बहु सेवह । गावे गीत रसाल भग्यरि वर करे सेवह ॥ नाभिराय कुलचन्द मात मरु देवी नन्दह । इन्द्र नमे तस पास नमे राय धरणिंदह ।। सेवा मनवांछित फले, जुग आदि जग वासीया । नारायण ब्रह्मचारी कहे जाणे चौद स्वर प्रकाशिया ॥ इति चतुर्दश स्वर पूजा समाप्तम् । अथ चतदेश तिथी पजा। मुख्या चतुर्दशाद्यायास्तिथयो मुनिनिर्मिताः । आह्वानन स्थापनादि विधिना तास्समर्चये ॥ ॐ ह्रीं धर्मकार्यप्रसिद्धचतुर्दशतिथियोऽत्रावतरावतर संवौषट् । अत्र तिष्ठ२ ठः ठः। अत्र मम संन्निहितो भव भव वषट स्वाहा । मुख्या प्रतिपदं बुध्या मुख्यदेव जिनेश्वरं । दोषनिमुक्तसत्पूज्यमर्चयामि जलादिभिः ।।
SR No.090154
Book TitleDigambar Jain Vratoddyapan Sangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorFulchand Surchand Doshi
PublisherDigambar Jain Pustakalay
Publication Year1986
Total Pages408
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, & Ritual
File Size20 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy