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________________ दि० जैन व्रतोद्यापन संग्रह 1 [ २३३ हुयण जस अभंग, पुणेण सुणर लहइ सुवण संग ॥९॥ पुणेण णियर गइ विलय जाइ, पुणेण तिरिय गइ दूर धाय । पुणेण कुसत्तुह हव मित्त, पुणेण सगुरुजण धरइ चित | १० | घत्ता । चउदह वर रयणा अणुछयमयणा, पुणय तु सिंदणर विभवा । सिरिविजयसूरिसा मुणिजणइसा, सिस्स नरायण कयसु तवा ॥ ॐ ह्रीं चतुर्दशरत्नाधिपतिचक्रवर्तिभ्यो महाघं । सेनापतिप्रमुख रत्न महाप्रभावावाधिपा विमलबुद्धिमहस्वभावाः ॥ संपूजक प्रमुख भव्यजनान्सु पूज्याः ॥ कीर्ति सुबुद्धिविभव सततम् दिशन्तु ॥ इत्याशीर्वादः । छप्पा । सेनापति वर रयणय पति गृहपति वरख्यात ह । गयवर हय वर रयण युवति सुचक्र विभातह || चर्म नाम मणि रयण काकिणी फुनि रथण पुरोधह । छत्र खड्ग फुनिरयण दण्ड फुनि रयण प्रबोध || एह चउदह रयण घर, चक्रवर्ति पातक हरो । नारायण ब्रह्मचारी कहे, सकल संघ मँगलकरो ॥ इति चतुर्दश रत्नाधिपतिपूर्ण' समोरी
SR No.090154
Book TitleDigambar Jain Vratoddyapan Sangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorFulchand Surchand Doshi
PublisherDigambar Jain Pustakalay
Publication Year1986
Total Pages408
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, & Ritual
File Size20 MB
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