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________________ __१५६ ]_ दि० जैन ब्रतोद्यापन संग्रह । सुखं करण ॥१॥ जय वर निःशंकित गुण विशाल, परहित निखिल शंकादि जाल । जय पर निःकांक्षित भोग दूर, शिवगति सुखकारण कुमुदसर ॥२॥ जय निर्विचिकित्सा गुण गरिष्ट, निर्नाशित विचिकित्सादि कष्ट । जय निहित सकल मढत्व भाव, जय भवनिधि भव्य समूह नाव ॥३॥ जय उपगृहन वर निहित दोष, परिकृत मुनिजन बहु हृदय तोष । जय वृष पतनादि निवार धीर, दूरीकृत भव भय दोष धीर ॥४॥ जय वत्सलत्व बहुगुण निधान, परिकल्पित सुरनर अखिल मान । जय जिनशासन विख्यातकार, विधि गुण संसार समुद्रतार ॥५॥ जय जिनवर गणधर गुण करंड, संस्कृत मिथ्यासुख पाप दंड । जय सुरनरपति पद जन मूल, मिथ्यातम मोहित हृदयशूल ।। इति दृगगुण संस्तुति ममला महामति रिहयः पठति परमभक्त्या । रत्नत्रय सम यातिरखिलभुवनपतिरात्मपाणिगत कृतमुक्तिः ॥ सम्यक पदांकितसुदर्शनमादिधर्मः । स्वर्गापवर्गफलदं गणरत्नपात्रं ॥ सायुधनं शुभगमित्रकलत्रपुत्रं । देयाद्विभो भुवि सुदर्शन रत्नमय॑ ।। इत्याशिर्वादः।
SR No.090154
Book TitleDigambar Jain Vratoddyapan Sangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorFulchand Surchand Doshi
PublisherDigambar Jain Pustakalay
Publication Year1986
Total Pages408
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, & Ritual
File Size20 MB
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