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________________ दि. जैन व्रतोद्यापन संग्रह । [१४७ मण धरउ विणच संघाधिकार, मुणि अजय भाव वसाधिकार ॥२॥ पुण शील रयण पालो विशाल, णव भेद भाव वर हो दयाल । मण धरहू जीव गाणोपयोग, जह भावे करे कम्मारि रोग ॥३॥ णिय हृदय धरउ संवेग भाव, जाणी लगि हो अचल पमाण । दिज्जइ अक्खय सम्पत्त दाण, लीजे तिलोय मजे सुजाण ॥४॥ तब तको जीव बारह पयार, सब साधु समाहि भवाब्धिपार । मण धरहु वैयाविधि सु अङ्ग, अरिहंत भक्ति कम्मारि भंग ॥५॥ आयार भक्ति भव दुःख छेद, बहु सुयण भक्ति अणाण भेद । आवश्यकेन कम्मट्ट णास, पवयण भत्ति मुत्ति भिवास ॥६॥ निण मग्ग पहावण धम्म धीर, पवयण पालो भव्य सुवीर । जे सोलहकारण पालयंत, ते माणव अविचल पद लहन्त ॥७॥ घत्ता । भवदुःहछंडण मोक्खविमंडण, कम्मविखंडण वयधुरीयं चन्द्रकित्ति मुनीवरपद परम, धर बम्भणाण अंगीकरीयं ॥ ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्धयादिषोडशकारणेभ्यो पूर्णार्धं । त्रैलोक्ये वरदां शुद्धां जराभयविनाशिनी । पूजां ते प्रददाम्युच्चैः शांतिधारा त्रयात्मिकां ।। इति शांतिधारा । AVIA
SR No.090154
Book TitleDigambar Jain Vratoddyapan Sangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorFulchand Surchand Doshi
PublisherDigambar Jain Pustakalay
Publication Year1986
Total Pages408
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, & Ritual
File Size20 MB
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