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________________ दि० जेन व्रतोद्यापन संग्रह । [१४५ संघ, जय मग्ग पहावण सिद्धि जंघ । जय मग्ग पहावण चैत्य देव, जय मग्ग पहावण मुणिव सेव ॥४॥ जय मग्ग पहावण रामसेन, जय मग्ग पहावण रविषेण । जय मग्ग पहावण चन्दकीत्ति, जय मग्ग पहावण सह सम्पत्ति ॥५॥ घत्ता । इह मग्ग पहावण पाव निवारण, सिरिभूषण णिय वयण धरो । सिरि जिणमत पोषण कम्म विशोषण बम्भणाण शिव सुक्ख करो ॥ ॐ ह्रीं मार्गप्रभावनाय पूर्णा । अथ प्रवचन वात्सल्य भावना । सर्वज्ञवदनोद्भुत सारसौख्यकरं नृणां । स्थापये धर्मसिद्धियर्थ वत्सलत्व प्रवाचकं ॥ ॐ ह्रीं प्रवचनवात्सल्यांगत्रावतर २ संवौषट् । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् । शीलसंपत्तियुक्तानां चारित्रप्रतिपालिनां । यत्र संक्रियते मान तद्वात्सल्यं बुधैः स्मृत॥ ॐ ह्रीं विविधसांगोपांगयुक्ता वधनवात्सल्यांगाय जला० ॥
SR No.090154
Book TitleDigambar Jain Vratoddyapan Sangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorFulchand Surchand Doshi
PublisherDigambar Jain Pustakalay
Publication Year1986
Total Pages408
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, & Ritual
File Size20 MB
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