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________________ दि० जैनव्रतोद्यापन संग्रह | अथ जयमाला । णाण उदयकर पाप तिमिर हर सुह साताभर बोधमयं । मदि सुदि उहिं मण पज्जयमदि केवल णाण महो उदयं || १ || पवयण भत्ति भवोदधि तारण, पवयण भत्ति कुकम्म निवारण | पवयण भत्ति कषाय विहंडणी, पवयण भत्ति कुकम्म विखंडणी ||२|| पवयण भत्ति सूद णाण पयासे, पवयण भत्ति शिव फल भासे । पवयण भत्ति कुमग्ग विणासइ, पवयण भत्ति सुमग्ग निवासइ || ३ || पवयण भत्ति परमइ संचइ, पवयण भत्ति महामद वंचइ । पवयण भत्ति सुगुण भण्डारह, पवयण भत्ति सफल संसारह || ४ || पवयण भत्ति कुरुप सुरुपी, पवयण भत्ति अखय सुह कूपी । पवयण भत्ति कुमति छन्डइ, पवयण भत्ति सुगति पद मन्डइ ॥५॥ - घत्ता । पवयण भत्ति सदा सुहकारी, पवयण भत्ति पालो वय धारी । सिरिभूषण जिण णाह पयारी, पचयण वंदे ब्रह्म विचारी ॥ [ १३९ ॐ ह्रीं प्रर्वचनभक्तये पूर्णार्थ ।
SR No.090154
Book TitleDigambar Jain Vratoddyapan Sangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorFulchand Surchand Doshi
PublisherDigambar Jain Pustakalay
Publication Year1986
Total Pages408
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, & Ritual
File Size20 MB
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