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________________ दि० जैन व्रतोद्यापन संग्रह | अथ जयमाला । तव धम्म विचारह गुण भण्डारह, सक सुखकारह कम्महरं । रिसि हेसर कहियं कम्म विदहियं, तिहुयण महियं धम्म परं ॥ १ ॥ शुद्धतवेण सुजाण भण्डारह, शुद्धतवेण सुजाण विचार | शुद्धतवेण कषाय विणासह, शुद्धतवेण सकल सद्भाव || २ || शुद्ध तवेण अमरपद पावर, शुद्धतवेण सकल चय भारत । शुद्धतवेण तिलोयह सिद्धि, शुद्धतवेण जिनंदह रिद्धि ॥३॥ शुद्धतवेण सुदेव सहाय, शुद्धतवेण णमइ अरि पाय । शुद्धतवेण कुयोनि विछिज्जड़, अहनिशि शुद्ध तवो इम किजइ || ४ || कम्मकलंक जलंजलि दिज्जइ, शुद्धतवेण परम पद लिज्जइ । शुद्धतवेण भयमद खण्डण, शुद्धतवेण परम पद मण्डण ||५|| घत्ता । बारह तपसारह कम्म निवारणह [ ११५ सासह सुह संपयकरण । सिरिभूषण कहियो तिहुयण महियो, बंभणाण भव भयहरणो ॥ ॐ ह्रीं शक्तितस्त्यागतपसे पूर्णा ।
SR No.090154
Book TitleDigambar Jain Vratoddyapan Sangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorFulchand Surchand Doshi
PublisherDigambar Jain Pustakalay
Publication Year1986
Total Pages408
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, & Ritual
File Size20 MB
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