________________
१०४ ]
दि० जैन व्रतोद्यापन संग्रह ।
अथ जयमाला। त्रिभुवननिर्जित चरणं, भवभय हरणं सविपातिक दूरी करणं । किल शिवसुख करणं, भवजल तरणं हतभय मरणं सुगुणमई ।।१॥ दंसण हीण भमई संसारह, दसण हीण लहइ अवतारह । दंसण हीणय कुगइ पामइ, दसण हीण भमइ संसारह ॥ २ ॥ दंसण हीण लहइ अवतारह, दंसण हीण णर दुह गमइ । दसण हीण भमइ छहु कालह, दंसण हीण पडइ जंजालह ।।३। दंसण हीण निगोद जावइ, दसण हीण भमइ त्रसथावर । दसण हीण लहह महादुःखह, दसण हीण न पामइ सुखह ॥४॥ दसण होई सुरपद दाता, दसण सुगति रमणी सुह साता । द सण केसरपद धरइ, दसण इन्द अमर सुह करइ ।।५।। दसण कम्मकलङ्क विणासण, दंसण धम्मकरण्ड णिवासण । दसण भव सायर वर तारण दसण अविचल शिवपदकारण ॥६॥ भुवि दसण सारह कम्म णिवारण, धम्म रहण शिव सुहभण्डारह । सिरिभूषण भव्य गतमदगद्य, चन्द्रकीर्ति सिद्धांत कहे ।। ७ ।।
ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्धये पूर्णाघ ।