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________________ .१.६६ +धर्मस्तवावर: 639) प्राज्ञेः प्राप्तसमस्तशास्त्र] हृदायः प्रव्यक्तलोकसितः प्रास्ताशः प्रतिभापरः प्रसमवान् श्रागेव दृष्टोत्तरः । प्रायः प्रश्नसहः प्रभुः परमनोझरी परानिवा ब्रूयाद्धर्मकथां गणी गुणनिधिः -यस्पमर्थमभ्यशरः ।। ११.६* २ 640) मुख्योपचारविवृतस्वपराग्र हो यस्तीर्थं प्रवर्तयति निश्वत्पतिविज्ञः । शिष्यावबोधनकृत्तेः व्यवहारदर्शी भूतार्थोध विधुरो हि भवः समाः ॥ १७ 641) यो वेत्ति वा दिशति वा व्यवहारमेव तस्यास्ति देशनविधिर्न मतो नितान्तम्' । अज्ञात निश्चयनयस्य स एव सत्यः सिंहाविदः पृथुकं एव यथास्ति सिंहः ॥ १८ [ ९.११*२= जो विद्वान गणी - आचार्य - समस्त शास्त्रों के रहस्य का ज्ञाता लोकव्यवहार से परिचित, निःस्पृह, प्रतिभा - नवीन नवीन तर्कणारूप बुद्धि से सम्पन्न, शांत, शंका के पूर्व ही उसके समाधान का अन्वेषक, प्रायः कर के सब प्रकार के प्रश्नों को सहनेवाला - उनसे उद्विग्न न होनेवाला प्रभावशाली, दूसरों के चित्त को आकर्षित करनेवाला, परनिन्दा से दूर, अनेक गुणों से विभूषित तथा स्पष्ट व मधुर भाषण करनेवाला हो वही धर्मकथा के कहने का अधि कारी - तत्त्व व्याख्याता - होता है ।। १६* २ ॥ जो मुख्य ( निश्चय) और उपचार (व्यवहार) के आश्रित विवरणों से स्व और पर को ग्रहण करनेवाला है, अर्थात् जो निश्चय नय के अनुसार आत्मस्वरूपको ग्रहण करता है तथा व्यवहार नयके अनुसार पर पदार्थों को ग्रहण करता है वह निश्चय नय से परिचित होकर तीर्थका प्रवर्तन करता है तथा व्यवहार को देखता हुआ तदनुसार शिष्यों को प्रबोधित करता है । लोक में अधिकतर सब ही संसारी प्राणी यथार्थ ज्ञानसे विमुख हैं - निश्चय को छोड़कर एक मात्र व्यवहार में निरत हैं ॥ १७ ॥ जो केवल व्यवहारको ही जानता है और उसका ही उपदेश करता है, उसे शिष्योंको उपदेश देने का अधिकार सर्वथा नहीं माना गया है । क्योंकि जिसको निश्चय नय का ज्ञान १६९२ ) 1. प्रज्ञायुक्तः. 2 आशा रहितः । १७ ) 1 व्यवहार 2P ° विवृतास्तपराग्रहो 3 PD रहित: 4 D संसारः । १८) 1 अतिशयेन. 2 बालकसिंहः, D बालकपुरुषस्य सिंहनाम स एव सिंहः ।
SR No.090136
Book TitleDharmaratnakar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJaysen, A N Upadhye
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh
Publication Year1974
Total Pages530
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Principle
File Size38 MB
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