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________________ देवागम ४२ विषय पृष्ठ विषय द्वैतापत्ति २७ कार्यके सर्वथा असत् होनेपर द्वैतके बिना अद्वैत नहीं होता २७ दोषापत्ति पृथक्त्व-एकान्तकी सदोषता २८ क्षणिकैकान्तमें हेतुफल-भावादि एकत्वके लोपमें सन्तानादिक नहीं बनते नहीं बनते संवृति और मुख्यार्थकी स्थिति ४० ज्ञानको ज्ञेयसे सर्वथा भिन्न चतुष्कोटि-विकल्पके अवक्तव्य माननेमें दोष की बौद्ध-मान्यता बचनोंको सामान्यार्थक माननेमें अवक्तव्यकी उक्त मान्यतामें दोष ४१ निषेध सत्का होता है असत्का दोष नहों उक्त उभय तथा अवक्तव्य एकान्तोंकी सदोषता अवस्तुकी अवक्तव्यता और पृथक्त्व-एकत्त एकान्तोंका वस्तुकी अवस्तुता सर्वधर्मोंके अवक्तव्य होनेपर अवस्तुत्व-वस्तुत्व ३१ ।। उनका कथन नहीं बनता ४५ एकत्व-पृथक्त्व एकान्तोंकी अवाच्यका हेतु अशक्ति, अभाव निर्दोष व्यवस्था ३२ या अबोध ? विवक्षा तथा अविवक्षा सत्की क्षणिकैकान्तमें हिंसा-अहिंसादि ही होती है " की विडम्बना ४७ एक वस्तुमें भेद और अभेदकी नाशको निर्हेतुक माननेपर अविरोध-विधि ३३ दोषापत्ति नित्यत्व-एकान्तकी सदोषता ३५ विरूपकार्यारम्भके लिये हेतुकी प्रमाण और कारकोंके नित्य मान्यता में दोष होनेपर विक्रिया कैसी ? ३६ स्कन्धादिके स्थित्युत्पत्तिव्यय कार्यके सर्वथा सत् होने पर नहीं बनता उत्पत्ति आदि नहीं बनती , उक्त उभय तथा अवक्तव्य नित्यत्वैकान्तमें पुण्य-पापादि एकान्तोंकी सदोषता नहीं बनते ३८ नित्य-क्षणिक-एकान्तोंकी क्षणिक-एकान्तकी सदोषता ३८ निर्दोष व्यवस्थाविधि
SR No.090131
Book TitleDevagam Aparnam Aaptmimansa
Original Sutra AuthorSamantbhadracharya
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1967
Total Pages196
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, P000, & P015
File Size12 MB
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