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________________ प्रस्तावना -४३ मुख्य और अन्य धर्म गोण हैं ।" इसे समझने के लिये उन्होंने प्रत्येक कोटि ( भङ्ग - वचनप्रकार ) के साथ 'स्यात् ' निपात-पद लगानेकी सिफारिश की और 'स्यात्' का अर्थ 'कथञ्चित् ' - किसी एक दृष्टि - किसी एक अपेक्षा बतलाया । साथ ही उन्होंने प्रत्येक कोटिकी निर्णयात्मकताको प्रकट करने के लिए प्रत्येक वाक्यके साथ एवकार पदका प्रयोग भी निर्दिष्ट किया, जिससे उस कोटिकी वास्तविकता प्रमाणित हो, काल्पनिकता या सांवृतिकता नहीं । तत्त्वप्रतिपादनकी इन सात कोटियों को उन्होंने एक नया नाम भी दिया । वह नाम है भङ्गिनी प्रक्रिया - सप्तभङ्गी अथवा सप्तभङ्गन । समन्तभद्रकी वह परिष्कृत सप्तभङ्गी इस प्रकार प्रस्तुत हुई— १. ( क ) विधिनिषेधश्च कथञ्चिदिष्टौ विवक्षया मुख्यगुणव्यवस्था । स्वयम्भू० २५ । (ख) विवक्षितो मुख्य इतीष्यतेऽन्यो गुणोऽविवक्षो न निरात्मकस्ते । स्वयम्भू० ५३ । २. ( अ ) वाक्येष्वनेकान्तद्योती गम्यं प्रति विशेषणम् । स्यान्निपातोऽर्थ योगित्वात्तव केवलिनामपि ॥ आप्तमी० का० १०३ । ( आ ) तद्द्योतनः स्याद् गुणतो निपातः ३. स्याद्वादः सर्वथैकान्तत्यागात् किंवृत्तचिद्विधिः । युक्त्य० ४३ । आप्तमी० १०४ ४. ( क ) देवकारोपहितं पदं तदस्वार्थतः स्वार्थमवच्छिनत्ति ( ख ) अनुक्ततुल्यं यदनेवकारं व्यावृत्त्यभावान्नियमद्वयेऽपि । ५. प्रक्रियां भङ्गिनीमेनां नयैर्नयविशारदः । ६. ‘सप्तभङ्गनयापेक्षः ....... आप्तमी० १०४ । युक्त्य० ४१ । युक्त्य० ४२ । आप्तमो० २३ ।
SR No.090131
Book TitleDevagam Aparnam Aaptmimansa
Original Sutra AuthorSamantbhadracharya
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1967
Total Pages196
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, P000, & P015
File Size12 MB
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