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________________ कारिका ७० ] देवागम ६७ आश्रयीके बिना आश्रयका कोई अस्तित्व नहीं बनता । दोनोंके सर्वथा एक होनेपर द्वित्व-संख्या भी नहीं बनती और द्वित्वसंख्यामें संवृतिकी कल्पना करनेपर शून्यताका प्रसंग आता है; क्योंकि परमार्थतः द्वित्वसंख्याके अभावपर संख्येय जो पुरुष और चैतन्य उनकी भी कोई व्यवस्था नहीं बननी — ऐसी कोई वस्तु ही सम्भव नहीं जो सकलधर्मोसे शून्य हो । अतः सांख्योंका यह कार्य-कारणादिकी अनन्यताका एकान्त भी वैशेषिकोंके अन्यता एकान्तकी तरहसे नहीं बन सकता ।' उक्त उभय तथा अवक्तव्य एकान्तोंकी सदोषता विरोधान्नोभयैकात्म्यं स्याद्वाद - न्याय-विद्विषाम् । वाच्यतैकान्तेऽप्युक्तिर्नाऽवाच्यमिति युज्यते ॥ ७० ॥ 'यदि कार्य-कारणादिको अन्यता और अनन्यताके दोनों एकान्त एक साथ माने जाँय तो वे स्याद्वाद - न्यायके विद्वेषियोंके - सर्वथा एकान्तवादियोंके - यहाँ युगपत् नहीं बन सकते; क्योंकि उनमें परस्पर विरोध होनेसे उनका एकात्म्य अथवा तादात्म्य असंभव है । यदि अवाच्यता ( अनभिलाप्यता ) का एकान्त -कार्य-कारणादिका भेद - अभेद सर्वथा अवाच्य है ऐसा कहा जाय – तो यह कहना भी नहीं बन सकता; क्योंकि इस कहने से ही वह वाच्य ( अभिलाप्य ) हो जाता है । और जब यह कहना भी नहीं बन सकता तब अवाच्यतैकान्त-सिद्धान्तका परको प्रतिपादन कैसे बन सकता है ? नहीं बन सकता । माना जाय ( यदि बौद्धोंके द्वारा यह कहा जाय कि परमार्थसे तो वचनद्वारा किसी भी पदार्थ अथवा सिद्धान्तका प्रतिपादन नहीं. वनता - संवृतिके द्वारा ही बनता है, तो संवृतिके स्वयं मिथ्या
SR No.090131
Book TitleDevagam Aparnam Aaptmimansa
Original Sutra AuthorSamantbhadracharya
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1967
Total Pages196
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, P000, & P015
File Size12 MB
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