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| टीकार्थ : स विणणेओ भावासओ जिणुलो वह जिनेन्द्र कथित भावास्तव || जानना चाहिये। किस के सम्बन्ध से? अप्पणो आत्मा के। वह कौन?
आसवदि जेण कम्पपरिणामेण जिस परिणाम से कर्म आता है। दव्यासवणं परो होदि वह भावास्रव द्रव्यास्रव का हेतु होता है। शुभाशुभ रूप परिणाम से उपार्जित जी शुभाशुभ रूप आस्रव है, वही ज्ञानावरणादि रूप से परिणत द्रव्यास्रव होता है, यह अर्थ है। भावार्थ : जिन परिणामों से पुद्गलकर्मों का आगमन होता है, वह परिणाम भावास्रव कहलाता है। ज्ञानावरणादि कर्मों का आना द्रव्यास्त्रव है। भावास्त्रव द्रव्यास्रव का तथा द्रव्यास्त्रव भावास्रव का निमित्त कारण होता है।। 29 ।। 'पाठभेद : दन्यासवणं = कम्मासवर्ण।
॥29॥
उत्थानिका : एतद्द्वयोर्मध्ये भावास्रवस्वरूपमाह - गाथा : मिच्छत्ताविरदिपमादजोगकोहादयो स विण्णेया।
पण पण पणदस तिय चदु कमसो भेदा दु पुवस्स॥३० ।। टीका : सविण्णेया सम्यक्प्रकारेण विज्ञेयाः, के ते? भेदाः। कस्य? पुवस्स पूर्वस्य, भावात्रवस्य इत्यर्थ:। किं नामानो भेदा:? मिच्छत्ताविरदिपमादजोगकोहादयो-मिथ्यात्वाविरतिप्रमादयोगक्रोधादयः। कुतः? पण पण पणदस तिय चदु भेदा दु-पञ्च पञ्च पञ्चदश त्रय चत्वारो भेदात्। तत्र मिथ्यात्वं पञ्चप्रकारम्, 'सर्वं क्षणिकम्' इत्येकान्तदर्शी बौद्धाः। 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इत्येकान्तदर्शी ब्रह्माद्वैतवादी। विनयादेव मोक्ष इत्येकान्तदर्शी शैवाः। 'जिनस्य भोजनं कुर्वतः, साभरणे मोक्षः, स्रीनिर्वाणं च' इत्येकान्तदर्शी
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