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________________ [दव्यसंग्रह टीका : गइ सहयारी, गति सहकारी भवति । कोऽसौ ? धम्मो, धर्मद्रव्यम्। केषाम्? पुद्गलजीवानाम् । कथंभूतानाम् ? गड़परिणयाण गतिकर्मोदयाच्चतुर्गतिपरिणतानाम्, अत्राह - यदि तस्य गतिसहकारित्वे तादृशी शक्तिस्ति तदा स्थिति कुतस्तं किन्तु मनात कुतो अथ अच्छंताणेव सो पोइ धर्मस्तेषां अच्छन्तां तान् जीवपुद्गलान् स्थितिं कुर्वतां न नयति । कुतो ? अधर्मद्रव्योदयात् । अस्यैवार्थस्य समर्थनमुपमानमाह, तोयं जह मच्छाणं, यथा तोयं पानीयं मत्स्यानां सहकारित्वे भवति स तान्मत्स्यान् स्थितिंकुर्वतो न नयति, एवं धर्मः । उत्थानिका : जीव- - पुद्गल को धर्म गति में सहकारी होता है, ऐसा कहते हैं - गाथार्थ : [ जह ] जैसे [ गइपरिणयाण ] गतिपरिणत [ मच्छाणं ] मछलियों को [ गमण सहयारी ] गमन में सहकारी [ तोयं ] जल होता है [ तह ] वैसे [ पुग्गलजीवाण] पुद्गल और जीवों को [ गमणसहयारी ] गमन में सहकारी [ धम्मो ] धर्म होता है [ सो ] वह [ अच्छंता ] न चलते हुए को [ ] नहीं [ पोई ] चलाता ॥ 17 ॥ टीकार्थ: गइ सहयारी गति में सहकारी होता है। कौन? धम्मो धर्मद्रव्य । किन के? पुद्गल और जीवों के किस प्रकार ? गइपरिणयाण गति कर्मोदय से चतुर्गति में परिणति करने वाले । शंका : यदि गति में सहकार्य करने की उस की ऐसी शक्ति है, तब उस के स्थिति करते समय वह क्यों नहीं गमन कराता है? ऐसा क्यों है? समाधान : अच्छंता णेव सो छोड़ धर्म उन स्थिर रहते हुए जीव पुद्गलों को चलाता नहीं है, क्यों? अधर्मद्रव्य के उदय से । इस अर्थ के समर्थन के लिए 44
SR No.090129
Book TitleDravyasangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandramuni
PublisherBharatkumar Indarchand Papdiwal
Publication Year2000
Total Pages121
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size2 MB
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