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________________ दस्चसंगहा । कहा भी है कि - जैसे जल में कल्लेले उत्पन्न होती हैं, उसी प्रकार द्रव्य में उत्पाद और व्यय होता है। वे दोनों सूक्ष्म हैं, द्रव्य से अभिन्न हैं, परन्तु परस्पर में भिन्न हैं। भावार्थ : सिद्ध प्रभु अष्ट कर्मों से रहित, अष्ट गुणों से सहित, अन्तिम शरीर से कुछ कम प्रमाण वाले, उत्पाद-व्यय से सहित, नित्य, लोकान में रिणाम होते हैं ।। 4 पाठभेद : लोयाग्गट्टिदा = उप्पादवएहि = उप्पादवएहिं।। 14॥ .-.-. उत्थानिका : इदानीं जीवद्रव्यं व्याख्याय अजीवद्रव्यपञ्चप्रकारे स्वरूपमाह - गाथा : अज्जीओ पुण णेओ पुग्गलधम्मो अधम्म आयासो। कालो पुग्गल मुत्तो रूवादिगुणो अमुत्ति सेसा दु। 15॥ टीका : पुद्गलमूर्त: रूपादिगुणः, शेषाः पुनरमूर्ताः। अत्र व्याख्यानं पूर्वमेव कृतम्। उत्थानिका : अब जीवद्रव्य का व्याख्यान करने के बाद अजीवद्रव्य के पाँच प्रकारों का स्वरूप कहते हैं - गाधार्थ : [ पुण] पुन: [ पुग्गल ] पुद्गल [ धम्मो ] धर्म [ अधम्म] | अधर्म [ आयासो] आकाश[ कालो ] काल[अज्जीओ ] अजीव[णेओ] जानना चाहिये [ रूवादिगुणो] रूपादिगुणों से युक्त [ पुग्गल ] पुद्गल | [ मुत्तो] मूर्तिक है [ दु] और [ सेसा ] शेष [ अमुत्ति ] अमूर्तिक है।। 15 || || 141
SR No.090129
Book TitleDravyasangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandramuni
PublisherBharatkumar Indarchand Papdiwal
Publication Year2000
Total Pages121
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size2 MB
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