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साधमींजन
मिथ्यागुरुदेव सेव वीतरागदेव
( ३८ )
धन धन
बरस्त
भ्रमत्ताप
हरन
अति भरी ।
जाके विन पाये पाये भवविपति निज परहित अहित की कछू न सुधि परी ॥ १ ॥ घन. ॥
सुगुरुसेव
मिलनकी
जाके परभाव चित्त सुथिरता संशय भ्रम मोहकी सु वासना
देव
घरी,
ज्ञानघनझरी ॥ टेक ॥
चारों अनुयोग सुहितदेश शिवमगके लाह की सुचाह
सम्यक् तरु धरनि येह भवजलको तरनि समर भुजग
करी ।
टरी ॥ २ ॥ घन. ॥
परिहरी ।
उरघरी ।। ३ ।। घन. ।।
दिठपरी ।
विस्तरी ॥ ४ ॥ घन. ॥
करन
करिहरी ।
विषजरी ॥ ५ ॥ घन ॥
पूरवभव या प्रसाद रमनि शिव वरी । सेवो अब 'दौल' याहि बात यह खरी ॥ ६ ॥ घन ॥
साधर्मी बन्धुओं के परस्पर मिलने की यह घड़ी, यह अवसर धन्य हैं जिससे भ्रमरूपी ताप का नाश होकर ज्ञानरूपी वर्षा होती हैं। ऐसे अवसर की प्राप्ति के बिना इस भव में, इस संसार में अनेक दुःख पाते हैं, स्व और पर के हित और अहित का ज्ञान नहीं होता ।
परभाव अर्थात् अन्य के प्रति लगाव की भावना समाप्त होकर चित्त में स्थिरता आती है और संशय, भ्रम, मोह की वासनाएँ रुक जाती हैं। साधर्मी बन्धुओं के सत्संग से कुगुरु व कुदेव की सेवा करने की आदत छूट जाती है और हृदय में वीतरागदेव व गुरु की भक्ति जाग्रत होती है।
दौलत भजन सौरभ