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________________ (२०) ध्यानपान पानि गहि नासी, त्रेसठ प्रकृति अरी। शेष पचासी लाग रही है, ज्यौं जेवरी जरी॥ध्यान.॥ दुठ अनंगमातंगभंगकर, है प्रबलंगहरी। जा पदभक्ति भक्तजनदुख-दावानल मेघझरी॥१॥ध्यान.॥ नवल धवल पल सोहै कलमें, क्षुधतृषव्याधि टरी। हलत न पलक अलक नख बढ़त न गति नभमाहि करी॥२॥ध्यान.।। जा विन शरन मरन जर धरधर, महा असात भरी। 'दौल' तास पद दास होत है, वास मुक्तिनगरी॥३॥ध्यान.॥ इस पद में अरिहन्त की भक्ति की गई है जिन्होंने ध्यानरूपी तलवार हाथ में लेकर कर्मों की तिरेसर प्रकृतियों का नाश कर दिया है. शेष पिचासी प्रकृतियाँ जली हुई जेवड़ी (रस्सी) की भाँति रह गई हैं अर्थात् वे अब नवीन कर्म-बंधन नहीं कर सकतीं। जो कामरूपी दृढ़ हाथी को भंग करने के लिए बलवान सिंह हैं; जिनके चरण-कमलों की भक्ति, भक्तजनों की दुःखरूपी अग्नि को शमन करने के लिए - मेघ की झड़ी के समान है। जिनके शरीर में श्वेत रक्त है, जिनके क्षुधा व तृषा की बाधा नहीं है । जिनके पलक टिमटिमाते नहीं हैं, न नख बढ़ते हैं और न केश बढ़ते हैं । वे ऊपर आकाश में ही चलते हैं, गमन करते हैं अर्थात् केवलज्ञान होने के पश्चात् वे पृथ्वी से ऊपर गमन करते हैं। जिनको शरण के बिना, अनेक बार बुढ़ापा धारण कर-कर के, रोगों से ग्रस्त होकर असाता से, दु:खभरी मृत्यु होती है । दौलतराम कहते हैं कि उनके चरणों में रहने से मुक्तिपुरी में - मोक्ष में रहने का सौभाग्य मिलता है। पल = मांस व रुधिर; कल .. शरोर; अलक = केश की लटें । दौलत भजन सौरभ
SR No.090128
Book TitleDaulat Bhajan Saurabh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTarachandra Jain
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year
Total Pages208
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Devotion, & Worship
File Size3 MB
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