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________________ जिन्होंने मोहनीय कर्मरूपी बलीता ( ईंधन ) व इंद्रिय विषयों के वेदन को तप की अग्नि में भस्मकर अघातिया कर्मों की राख उड़ाई; जिसके कारण उनका मोक्षरूपी लक्ष्मी से मिलन हुआ। लाख चतुराई करो पर ऐसे सम्यक्ज्ञान का फाग - होलिकोत्सव का संयोग बड़े सौभाग्य से प्राप्त होता है। दौलतराम कहते हैं कि वह सब जो दीनदयालु, कृपालु गुरु ने तुझे बता दिया है उसे चित्त से न भुला अर्थात् सदैव ध्यान में रख । पूरक प्राणायाम में श्वास भीतर लेना; कुंभक प्राणायाम में श्वास को भीतर रोकना रेचक १२६ = = श्वास को बाहर निकालना | दौलत भजन सौरभ
SR No.090128
Book TitleDaulat Bhajan Saurabh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTarachandra Jain
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year
Total Pages208
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Devotion, & Worship
File Size3 MB
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