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________________ छेदसूत्रागम और दशाश्रुतस्कन्ध १०. दशाश्रुतस्कन्धं, 'त्रीणि छेदसूत्राणि' (हि० अनु०, विवेचन, टिप्पण सहित), सं० मुनि कन्हैया लाल 'कमल', जिनागम ग्रं०मा० सं० ३२, आगम प्रकाशन समिति, ब्यावर १९९२, पृ० ३ १२४, डबल डिमाई । ५५ आठवीं दशा पर्युषणाकल्प अथवा कल्पसूत्र जैसा कि सुविख्यात है कि दशाश्रुतस्कन्ध की आठवीं दशा को ही उद्धृत कर प्रारम्भ में जिनचरित और अन्त में स्थविरावली जोड़कर कल्पसूत्र नाम प्रदान किया गया है । पर्युषण पर्व के अवसर पर इसका पाठ करने से इसकी महत्ता एवं प्रचार दोनों में आशातीत वृद्धि हुई है। फलतः कल्पसूत्र पर व्याख्या साहित्य भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता है। इस पर लगभग ६० व्याख्याओं के लिखे जाने की सूचना उपलब्ध होती है। निर्युक्ति, चूर्णि और टिप्पणक, जो प्राचीन हैं और सम्पूर्ण छेदसूत्र की व्याख्या करते हैं, के अतिरिक्त चौदहवीं और अठारहवीं शताब्दी के मध्य ज्यादातर व्याख्या ग्रन्थों की रचना हुई है। इनकी सूची एच० डी० वेलणकर द्वारा सङ्कलित जिनरत्नकोश ( पृ० ७५-७९ पर) में दी गई है, जो निम्न हैं - दुर्गपदनिरुक्त (१२६८ ) - विनयचन्द्र, सन्देहविषौषधि (१३०७ ) - जिनप्रभ, खरतरगच्छीय, पञ्जिका- जिनसूरि, अवचूरि (१३८६) - जिनसागरसूरि, सुखावबोधविवरण- जयसागरसूरि, किरणावली (१५७१) - धर्मसागरगणि, अवचूरि (१९८७) - अमरकीर्ति, कल्पलता (१६१४ ) - शुभविजय, प्रदीपिका (१६५७) - संघविजयगणि, दीपिका (१६२० ) - जयविजयगणि, मञ्जरी (१६१८) - सहजकीर्तिगणि एवं श्रीसार, दीपिका शिशुबोधिनी (१६४१) - अजितदेव सूरि, कल्पलता (१६४२) - समयसुन्दर, खरतरगच्छीय, सुबोधिका (१६३९) - विनयविजय, कौमुदी (१६५० ) - शान्तिसागर, तपागच्छीय, बालावबोध (१६५०) - बुधविजय, दानदीपिका (१६६५ ) - दानविजय, दानदीपिका (१६९३)-दानविजयगणि, तपागच्छ, कल्पबोधिनी (१७३१) - न्यायसागर, तपागच्छ, कल्पद्रुमकलिका (लगभग १८३५) - लक्ष्मीवल्लभगणि, खरतरगच्छ, सूत्रार्थप्रबोधिनी (१८९७)-विजयराजेन्द्रसूरि, त्रिस्तुतिगच्छ, कल्पलता, गुणविजयगणि, तपागच्छ, दीपिका- बुद्धविजय, अवचूरि उदयसागर, अञ्चलगच्छ, अवचूरि - महीमेरु, कल्पोद्योत-न्यायविजय, अन्तर्वाचना (१४००) - गुणरत्नसूरि, अन्तर्वाचना - कुलमण्डन सूरि, अन्तर्वाचना - रत्नशेखर, अन्तर्वाचना- जिनहंस, अन्तर्वाच्य - भक्तिलाभ, अन्तर्वाच्य - जयसुन्दसूरि अन्तर्वाच्य - सोमसुन्दसूरि, स्तबक पार्श्वचन्द्रसूरि, रामचन्द्रसूरि, मडाहडगच्छ, स्तबक (१५८२)-सोमविमलसूरि, तपागच्छ, बालावबोध- क्षमाविजय, बालावबोध (१६५० ) - मेरुविजय, स्तबक (१९७२)विद्याविलासगणि, खरतरगच्छ, बालावबोध (१६७६ ) - सुखसागर और माङ्गलिकमाला (१७०६)। स्तबक
SR No.090127
Book TitleAgam 37 Chhed 04 Dashashrutskandh Sutra Ek Adhyayan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAshok Kumar Singh
PublisherParshwanath Vidyapith
Publication Year1998
Total Pages232
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Philosophy, & agam_related_other_literature
File Size13 MB
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