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________________ १८ दशाश्रुतस्कन्धनियुक्ति : एक अध्ययन षडावश्यक नामक अधिकार में यथावत् मिलती है। इससे भी यह फलित होता है कि नियुक्तियाँ कम से कम नियमसार और मूलाचार की रचना के पूर्व अर्थात् छठी शती के पूर्व अस्तित्व में आ गई थीं। ६. नियुक्तियों के कर्ता नैमित्तिक भद्रबाहु नहीं हो सकते, क्योंकि आचार्य मल्लवादी (लगभग चौथी-पाँचवीं शती) ने अपने ग्रन्थ 'नयचक्र' में नियुक्तिगाथा का यह उद्धरण दिया है- नियुक्ति – “वत्थूणं संकमणं होति अवत्थूणये समभिरूढे' जो इङ्गित करता है कि वलभी वाचना के पूर्व नियुक्तियों की रचना हो चुकी थी। ७. पुन: वलभी वाचना के आगमों के गद्यभाग में नियुक्तियों और सङ्ग्रहणी की अनेक गाथाएँ मिलती हैं, जैसे ज्ञाताधर्मकथा (मल्ली अध्ययन) में तीर्थङ्कर नाम-कर्म-बन्ध सम्बन्धी २० बोलों की गाथा मूलत: आवश्यकनियुक्ति (१७९-१८१) की गाथा है। इस प्रकार वलभी वाचना के समय नियुक्तियों और सङ्ग्रहणीसूत्रों से अनेक गाथायें आगमों में डाली गई हैं। अत: नियुक्तियाँ और सङ्ग्रहणियाँ वलभी वाचना की पूर्ववर्ती हैं। ८. नियुक्तियों की सत्ता वलभी वाचना के पूर्व थी, तभी तो नन्दीसूत्र में आगमों की नियुक्तियों का उल्लेख है। अगस्त्यसिंह की दशवैकालिकचूर्णि के उपलब्ध एवं प्रकाशित हो जाने पर भी यह बात पुष्ट हो जाती है कि आगमिक व्याख्या के रूप में नियुक्तियाँ वलभी वाचना के पूर्व लिखी जाने लगी थीं। इस चूर्णि में प्रथम अध्ययन की दशवैकालिकनियुक्ति की ५४ गाथाओं की भी चूर्णि की गई है। यह चूर्णि विक्रम की तीसरी-चौथी शती में रची गई थी। इससे यह तथ्य सिद्ध हो जाता है कि नियुक्तियाँ भी लगभग तीसरी-चौथी शती की रचना हैं। ज्ञातव्य है कि नियुक्तियों में भी परवर्ती काल में पर्याप्त रूप से प्रक्षेप हुआ है, क्योंकि अगस्त्यसिंहचूर्णि में दशवैकालिक के प्रथम अध्ययन की चूर्णि में मात्र ५४ नियुक्ति गाथाओं की चूर्णि हुई है, जबकि वर्तमान में दशवैकालिकनियुक्ति में प्रथम अध्ययन की नियुक्ति में १५१ गाथाएँ हैं। इस सम्बन्ध में एक आपत्ति यह उठाई जा सकती है कि नियुक्तियाँ वलभी वाचना के आगमपाठों के अनुरूप क्यों हैं? इसका प्रथम उत्तर तो यह है कि नियुक्तियों का आगम पाठों से उतना सम्बन्ध नहीं है, जितना उनकी विषय-वस्तु से है और यह सत्य है कि विभिन्न वाचनाओं में चाहे कुछ पाठ-भेद रहे हों, किन्तु विषय-वस्तु में एकरूपता रही है और नियुक्तियाँ मात्र विषय-वस्तु का विवरण देती हैं। पुनः नियुक्तियाँ मात्र प्राचीन स्तर के और बहुत कुछ अपरिवर्तित रहे आगमों पर ही हैं सभी आगम ग्रन्थों पर नहीं। इन प्राचीन स्तर के आगमों का स्वरूप-निर्धारण
SR No.090127
Book TitleAgam 37 Chhed 04 Dashashrutskandh Sutra Ek Adhyayan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAshok Kumar Singh
PublisherParshwanath Vidyapith
Publication Year1998
Total Pages232
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Philosophy, & agam_related_other_literature
File Size13 MB
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