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________________ नश्विरण का उपसंहार ] [ ७६ नित्य प्रशद्ध पर्यायाथिक, जैसे संसारियों की उत्पत्ति और मरण होते हैं । इसप्रकार पर्यायाथिक के ६ भेद हैं। उपसंहार ये नय पूर्व-पूर्व, विरुद्ध, महाविषयवाले और उत्तरउत्तर सूक्ष्म, अल्प, अनुकूल विषयवाले होते हैं । तेईज्ञानयन्त जीव (सर्वया) करम के उदै केउ देव परजाय पावें, भोग के विलास जहां करत अनूप हैं । महा पुण्य उदै केउ नर परजाय लहैं, अति परधान बड़े होइ जग भूप हैं ।। केउ गति हीन पाय दुखी भये डोलत हैं, राग-दोष धारि पदें भवकूप हैं। पुण्य-पाप भाव यह हेय करि जानत हैं. तेई ज्ञानवन्त जीव पावै निजरूप हैं ॥४।। (दोहा) प्रतुल अविद्या वसि परै, धरै न प्रातमज्ञान । परपरणति में पगि रहै, कैसे ह निरवान ।।५।। - पंडित श्री दीपचन्द शाह : उपदेशसिद्धान्त रत्न छन्द ४ व ५ W wwwwwYW.
SR No.090125
Book TitleChidvilas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipchand Shah Kasliwal
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages160
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Spiritual
File Size2 MB
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