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________________ ', समाधि का स्वरूप J ( १३७ पूरे, उसे 'पूरक' कहते हैं। तथा जो वायु को कुम्भ (घट) की भाँति भरता है और भरकर स्थिर करता है, उसे 'कुम्भक' कहते हैं । फिर जो धीरे-धीरे वायु का रेचन करता है, उसे 'रेचक' कहते हैं । पाँच घड़ी तक किये जानेवाले कुम्भक को 'धारणा' कहते हैं और साठ घड़ी तक किये जानेवाले कुम्भक को 'ध्यान' कहते है । उससे श्राधे समय का किया जानेवाला कुम्भक 'समाधि' कहलाता है । वास्तव में यह समाधि कारण है, क्योंकि इससे मन की जय होती है और मन की जय करने से राग-द्व ेष- मोह मिटते हैं और राग-द्वेष- मोह मिटने से समाधि लगती है । यदि मन स्थिर हो तो निज गुणरत्न प्राप्त किया जा सकता है, अतः समाधि कारण है । कोई न्यायवादी न्याय के बल पर छहों मतों के अनुसार परन्तु वहाँ समाधि नहीं, समाधि का निर्णय करते हैं; बल्कि केवल विकल्प हेतु है । जैनमत में तो अरहंतदेव ने जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संबर, निर्जरा और मोक्ष- ये सात तत्त्व कहे हैं । प्रत्यक्ष और परोक्ष ये दो प्रमाण कहे हैं । नित्य श्रनित्यादि अनेकान्तवाद है । सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र रूप मोक्षमार्ग है | संपूर्ण कर्मों का क्षय हो जाना मोक्ष है । नैयायिकमत में उनके जटाधारी ईश्वरदेव ने प्रमाण,
SR No.090125
Book TitleChidvilas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipchand Shah Kasliwal
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages160
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Spiritual
File Size2 MB
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