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________________ ढालाल 8 हिंसा के साधनभूत फरसा, कृपाण, तलवार धनुष, हल, अग्नि आदि दूसरों को स्वयं या मांगने से ४ ४ देना, हिंसा दान का अनर्थदंड है। ५ दुःश्र ति--राग-द्वेष को बढ़ाने वाली और चित्त को ले छह कलुषित करने वाली, आरम्भ, परिग्रह, मिथ्यात्व युद्ध राग--रंग भृगार प्रावि को कथाओं को सुनना सो दुःश्रुति नामका पांचवां अनर्थ वंर है। इस प्रकार के अन्य भी अनर्थयों का त्याग 8 & करना सो अनर्थदंड त्याग नामका तीसरा गुणवत है। अब चार शिक्षाबतों का वर्णन करते हैं । जिन के परिपालन से मुनिबत के धारण करने को ले शिक्षा मिले उन्हें शिक्षाबत कहते हैं । वे चार हैं-१ सामायिक शिक्षाप्रत २ प्रोषधोपवास शिक्षाव्रत, & ३ भोगोपभोग परिमाण शिक्षाबत, ४ अतिथि संविभाग शिक्षाप्रत । १ सामायिक शिक्षाव्रत-हृदय गर्भ में समता भाव धारण करके प्रातः काल, मध्यान्ह और & सायंकाल इन तीनों समय में स्वस्वरूप को चितवन रूप सामायिक करना, सो मामायिक नाम का & & शिक्षाप्रत है । सामायिक का उत्कृष्ट काल ६ घड़ी, मध्यम ४ घड़ो और जघन्य २ घड़ी माना गया 8 8 है। जो जिसको जैसी शक्ति हो उतने समय के लिए पांचों पापों का मन वचन काय से बिल्कुल त्याग करके प्राणीमात्र पर समता और मित्रताका भाव रखते हुए प्रात्म स्वरूप का चिन्तवन करते हुए प्रात्मा लवलीन होना चाहिए। सामायिक के काल में जो मन नहीं ठहरे तो *, सिद्ध, अहंन्त, ४ नवकार मन्त्र, चौबीस तीर्थंकरों के नाम, मूल मन्त्राक्षरों का जाप देना, स्तोत्र पाठ पढ़ना, सिद्ध भक्ति आदि दश भक्ति पाठ पढ़ना, परन्तु वह परम शान्ति से करना । सामायिक समता रस पान एकान्त शांत और उपद्रव रहित स्थान में करना चाहिए । इसी को ध्यानाध्यन भी कहते हैं यही करने योग्य है।
SR No.090124
Book TitleChahdhala 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDaulatram Kasliwal
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages170
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size4 MB
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