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________________ छहढ़ाला प्रश्न १६–सम्यक्त्व के आठ अंग' के नाम बताइये ? उत्तर-(१) निशङ्कित, (२) निकांक्षिल, (३) निर्विचिकित्सा, (४) अमूढ़दृष्टि, (५) न, (, यतिका, (:) वात्साल, (८) प्रभावना अंग । सम्यग्दर्शन के २५ दोष वसु मद टारि निवारि त्रिशठता, षट् अनायतन त्यागो । शङ्कादिक वसु दोष बिना, संवेगादिक चित्त पागो ।। अष्ट अंग अरु दोष पच्चीसों, तिन संक्षेपहु कहिये । बिन जानेनै दोष गुणन को, कैसे तजिये गहिये ।।११।। शब्दार्थ-मद = अहङ्कार । टारि = दूर कर । निवारि = हटकर । त्रिशठता = तीन मूढ़ता अथवा मूर्खता । षट् = छह । अनायतन = अधर्म के स्थान । चित्त = मन । गुणन = गुणों को । गहिये = ग्रहण करिये । अर्थ-आठ मद, तीन मूढ़ता, छह अनायतन, शङ्कादिक आठ दोष—इन पच्चीस दोषों को दूर कर प्रथम, संवेग, अनुकम्पा, आस्तिक्यइन गुणों में मन को लगाना चाहिये । आठ अंग और पच्चीस दोषों को संक्षेप में कहते हैं । क्योंकि बिना जाने दोषों को कैसे छोड़ सकते हैं और गुणों को कैसे प्राप्त कर सकते हैं। प्रश्न १---मूढ़ता किसे कहते हैं ? उत्तर-धर्म और सम्यक्त्व में दोषजनक अविवेकीपन के कार्य को मूढ़ता कहते हैं । ये तीन हैं-(१) देवमूढ़ता, (२) पाखण्डी मूढ़ता और (३) लोकमूढ़ता । प्रश्न २–देवमूढ़ता किसे कहते हैं ? उत्तर-वरदान की इच्छा से राग-द्वेषयुक्त देवताओं को उपासना करना देवमूढ़ता है । अथवा-(१) सच्चे देव समझकर सरागी देवों की पूजा आदि करना । पीपल, घट्टी आदि पूजना ।। प्रश्न ३–पाखण्डी मूढ़ता या गुरु मूढ़ता किसे कहते हैं ? उत्तर-राग-द्वेषी, आरम्भ परिग्रह सहित और झूठे साधुओं की सेवासुश्रूषा, पूजा-भक्ति करना गुरु मूढ़ता है ।
SR No.090123
Book TitleChahdhala 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDaulatram Kasliwal
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages118
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size2 MB
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