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।। श्री वीतरागाय नमः ।।
प्रथम ढाल
मंगलाचरण
(सोरठा) तीन मुक्न में सार, वीतराग विज्ञानता । शिवस्वरूप शिवकार, नमहुँ त्रियोग सम्हारिक ।।१।।
शब्दार्थ--तीन भुवन = तीन लोक । वीतराग = राग-द्वेष रहित । सार = श्रेष्ठ । शिवस्वरूप = आनन्दस्वरूप । शिवकार = मोह प्राप्त करने वाला । त्रियोग = मन, वचन, काय । सम्हारिकै = स्थिर हो करके । नमहुँ = नमस्कार करता हूँ
अर्थ तीन लोक में राग-द्वेषादि से रहित विशिष्ट ज्ञान, केवलज्ञान ही श्रेष्ठ है, आनन्दस्वरूप मुक्ति देने वाला उत्तम रत्न है । मैं ( दौलतराम ) उस केवलज्ञान के लिए मन, वचन, काय से एकतापूर्वक नमस्कार करता हूँ।
प्रश्न ---मंगलाचरण में किसे नमस्कार किया है ?
उत्तर—मंगलाचरण में राग-द्वेष रहित ज्ञान केवलज्ञान को नमस्कार किया है।
प्रश्न २-विज्ञान का अर्थ क्या है ?
उत्तर–वि याने विशिष्ट । ज्ञान याने जानना । जो ज्ञान सब पदार्थों को विशेषरूप से एकसाथ जानता है वह विशिष्ट ज्ञान याने केवलज्ञान है ।
प्रश्न ३–आधुनिक विज्ञान को भी तो विज्ञान कहते हैं ?
उत्तर—-ज्ञान सदैव स्वपरोपकारी होता है । आज का विज्ञान अशांति का कारण बन चुका है । सच्चा ज्ञान शान्ति का बीज है । ज्ञान रक्षक होता है, भक्षक नहीं । आज का विज्ञान विशिष्टता से दूर हो मानव को अशान्ति की ओर ले जा रहा है । इसलिए नाम से विज्ञान कह सकते हैं, पर वीतराग विज्ञान सच्चा केवलज्ञान ही है।