SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 239
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ यतुविज्ञति स्तोत्र जो प्रकट चिद् प्रभा से भास्वर है वह ज्ञान प्रभा से ही सम्पन्न है । जो ज्ञान प्रकाश ज्योति स्वरूप नहीं है वह इससे भिन्न विभावमयी है | क्योंकि अपने ज्ञानधन स्वभाव रूप सतत-सर्वत्र यह प्रकाशित ही हो रही है । अतः यही इसका वैभव है और इसी अनन्त दिव्य ज्योति से शुद्धात्मा युक्त है परिपूर्ण भरा है-उपग ही है ।।१४।। परम विशुद्ध चेतना ही मात्र प्रकाशमान होती है । चेतना रहे और उसका प्रकाश न हो यहअसत्य कल्पनामात्र है । यह तो अपने ही चैतन्य स्वभाव से सुशोभित होती रहती है । इसका विभाग करने वाला अन्य कोई भी प्रतिद्वन्दी नहीं है अतः यह ही अपने अखण्ड ज्योतिर्मय प्रकाशपुञ्ज स्वरूप है ।। १९ ।। चिज्ज्योति निरन्तर उदित रहती है । अपने ही स्व स्वभाव से भरित होती है । प्रत्यक्ष है, सम्पूर्ण कला युक्त है | आकुलता विहीन है | यह अद्भुत आश्चर्य जनक तेज का पुञ्ज है । अतः किसकी शक्ति है जो इसके प्रकाश को मंदकरने वाली रात्रि हो । सूर्य का प्रकाश रात्रिजन्य अंधकार में लीन हो जाता है, परन्तु इसका प्रकाश निर्द्वन्द प्रसरित ही रहता है ॥ २० ॥ __निषेध रूप प्रतिपक्षी धर्म के रहते हुए भी चिदात्मा विधिवत् अपने वैभवरूप ज्ञान स्वभाव को ही धारण करती है । परम विशुद्धता को प्राप्त होने पर एक ही ज्ञानभाव भरित होने पर यह आपकी परमोत्कृष्ट आभा किसके द्वारा निषिध्य हो सकती है ? किसी के द्वारा भी नहीं || २१ ।। १७३
SR No.090121
Book TitleChaturvinshati Stotra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMahavirkirti
PublisherDigambar Jain Vijaya Granth Prakashan Samiti
Publication Year
Total Pages327
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Devotion, & Worship
File Size5 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy