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________________ सूत्र ४८५-४८७ ममनोह-असमतोकों के मार संघ व्यवस्था [२३३ समणुण्णं-असमणुण्णाणं बवहारा समनोज-असमनोज्ञों के व्यबहार४८५. से समणुष्णस्स या असमणुग्णस्स वा असणं वा-जाब-साइम ४८५. भिक्षु समनोज्ञ (असोभोगिक) तथा अमनोज (शाक्यादि) खा, वत्थं वा-जाव-पायपुंछणं वा यो पाएग्जा, गोजिम को अशन - यावत् -स्वाय, वस्त्र - यावत्-पादपोंछन आदरतेजा, णो कुज्जा वेया वडिय-पर आदायमाणे । पूर्वक न दे, न निमन्त्रित करे और न उनकी अन्य वैयावृत्य भी करे। धुवं येतं जाणेज्जा--असणं या-जाब-साइम वा, वत्यं वा यदि शाक्यादि भिक्षु मुनि से कह कि – 'हे मुभिवर ! जाव-पायपुछणं वा लभिय, भुजिय, पंयं वियत्सा विओ- आपको अशन-पावत् -स्वाच, वस्त्र -यावत् - पादपोंछन प्राप्त हो या न हो, उनका उपयोग कर लिया हो या न कर लिया हो, मार्ग सीधा हो या टेढ़ा हो, तो भी हमारे यहाँ अवश्य माना। विभस्त धम्म झोसेमाणे समेमाणे चलेमाणे पाएज्जा बा, भिम धर्म का आचरण करने वाले वे कभी उपाश्रय में आकर णिमंतेज्जा वा, कुज्जा बेयावडिय परं अणाढायमाणे । कहे, कभी मार्ग में चलते हुए कहे, अथवा अशनादि दे या निम-आ. सु. १, ब.८, उ. १, सु. १६६ त्रित करे या वैयावरण करे तो मुनि उसके निमन्पण का आदर में करे। से समणुष्णे असमणुष्णस्स असणं वा-जाय-साहम वा, वत्थं वह समनोज्ञ (सुशील) भिक्षु असमनोज (कुशील) साधु को या-जाव-पायपुंछणं वा णो पाएक्जा, गो णिमंतेक्या, णो अशन-यावत् –स्वाद्य, वस्त्र-यायत्-पादपोंछन आदरपूर्वक कुज्जा वेयावडियं परं आवायमाणे। न दे, न निमन्त्रित करे और न उनकी वैयावृत्य करे। धम्ममायाणह पवेदितं माणेण महसया समणुषणं समणुग्णस्स दान धर्म के स्वरूप को जानकर केवलज्ञानी भगवान ने असणं या-जाव-साइमं था, वत्थ या-जाव-पाथपुछणं वा, प्रतिपादित किया है कि समनोज्ञ साधु समनोज्ञ (समान आचार पाएज्जा, निमसेज्जा, कुज्जा बेयावजिय परं आवायमागे। वाले सांभोगिक) साधु को आदरपूर्वक अशन-यावत्-स्वाद्य, -आ. सु. १, ८, उ. २, सु २०७-२०० वस्त्र यावत् -पादनोंछन आदि दे, उन्हें देने के लिये निमंत्रित करें तथा उनकी वैयावृत्य भी करे। सरिसगस्स संवास अदाण पायच्छित सुत्साई सदृश आचारवान को स्थान न देने के प्रायश्चित्त सूत्र--- ४८६. जे गिगये णिगंयस सरिसगस्स "अंते ओवासे सते" ४५६ जो निग्रन्थ सदृश आचार वाले मिर्गन्ध को अपने उपाश्रय ओवास न देइ, न त वा साइजद । में अवकाश होते हुए भी ठहरने के लिये स्थान नहीं देता है या नहीं देने वाले का अनुमोदन करता है । जा जिग्गंधी णिगंथीए सरिसियाए “अंते बरेवासे सते" जो निम्रन्थी सदृश आबार वाली निग्रन्थी को अपने उपाश्रय ओवासं न ह. न देतं वा साइज्जइ। में अवकाश होते हुए भी ठहरने के लिए स्थान नहीं देती है या -नि उ. १७. सु. १२१-१२२ नहीं देने वाले का अनुमोदन करतो है। (उसे लघु चौमासी प्रायश्चित्त आता है।) संभोगे पच्चक्खाण फलं] सम्भोग प्रत्याख्यान का फल४८७.१० -संभोगपच्चक्खाणेणं माते ! जीवे कि जणया? ४८७.प्र. -भन्ते । सम्भोग-प्रत्याख्यान (एक मांडलिक आहार का त्याग) करने वाला जी क्या प्राप्त करता है ? उ० . संभोगपश्चक्खाणेणं आलम्बणाई खबेह। निरालंब- उ-सम्भोग-प्रत्याख्यान से जीव का परालम्बीपन छूट णस्स य आयडिया जोगा भवन्ति । जाता है। उस परालम्बन के छूट जाने से मुक्ति के सारे कार्य स्वावलम्बन युक्त हो जाते हैं। सएणं लाभेणं संतुस्सा, पग्लामं नो आसाएइ, नो तकर, वह स्वयं जो कुछ मिलता है उसी में सन्तुष्ट हो जाता है। नो पोहेह, नो पत्थेद, नो अभिलसइ। परलामं अणास्साए- दुसरे मुनियों के लाभ का आस्वादन उपयोग नहीं करता, कल्पना
SR No.090120
Book TitleCharananuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year
Total Pages571
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Conduct, Agam, Canon, H000, H010, & agam_related_other_literature
File Size18 MB
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