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________________ ३०] चरणानुयोग धर्म का स्वरूप सूत्र ३३-३७ - - - . धम्मसरूवं धर्म का स्वरूप ३३. समयाए धम्म आरिएहि पवेदए। ३३. आर्यों ने समता में धर्म कहा है। -आ. सु. १, अ० ५. उ. ३, सु० १५७ अविरोहो धम्मो-. अविरोध धर्म३४. पूएहि म विवमा , एस धम्मे सोमओ। ३४. प्राणियों के साथ बैर-विरोध न कर, यही तीर्थंकर का या बुसिमं जग परित्राय, अस्सि जीवित-भावणा सुसंयमी का धर्म है । सुसंयमी साधु (बस-स्थावर रूप) जगत् का स्वरूप सम्यकरूप से जानकर इस वीतराग प्रतिपादिर धर्म में जीवित भावना (जीव-समाधान-कारिणी पच्चीस या बारह प्रकार की भावना) करे। मावणा-ओग-सुखरपा, जले नावा व आहिया । __भावनाओं के योग (सम्यक् प्रणिधान रूप योग) से जिसका नावा व तीर-संपला. सवदुक्खा तिउट्टा ।। अन्तरात्मा शुद्ध हो गया है, उसकी स्थिति जत में नौका के समान (संसार समुद्र को पार करने में समर्थ) कही गई है। किनारे पर —सू. सु. १. अ० १५, गा० ४-५ . पहुँची हुई नौका विश्राम करती है, वैसे ही भावनायोगसाधक भी संसार समुद्र के तट पर पहुँचकर समस्त दुःखों से मुक्त हो जाता है। आणा धम्मो आज्ञा धर्म३५. "आगाए मामगं धम्म" एस उत्तरवावे इह पागवाणं विया- ३५. भगवान महावीर ने कहा- 'मेरा अभिमत धर्म मेरी आज्ञा हिए। -आ. सु. १,०६, उ०२, सु०१८५ पालने में है, गानवों के लिए यह मेरा सर्वोपरि कथन है।" धम्मपरिणामाई धर्म के परिणाम३६. प०-धम्मसद्धार मंते ! जोवे कि जणयह ? ३६. प्रा- हे भगवन् ! धर्म-श्रद्धा से जीव को किस फल की प्राप्ति होती है? उम-धम्मसद्धाएणं सायासोक्सेसु रज्जमाणे विरज्जह । उ० हे गौतम ! सातावेदनीय कर्म जन्य सुख में अनुराग आगारधम्मं च गं यह । अणगारिएणं जीवे सारीर- रखता हुआ यह जीव वैराग्य प्राप्त करता है, फिर गृहस्थधर्म माणस.णं तुषखाणं यण-भेयण-संजोगाणं-वोच्छेयं को छोड़कर अनगार-धर्म को ग्रहण करता हुआ मारीरिक और करेइ, अव्वाबाहं सुहं मिस्वतंई। मानसिक दुःखों का छेदन, भेदन तथा अनिष्ट संयोगजन्य मानसिक दुःख का व्यवच्छेद कर देता है। तदनन्तर सर्व बाधा रहित सुख -उR० अ० २६. सु०५ का संपादन करता है। धम्मस्स भेयप्पभैया धर्म के भेद-प्रभेद३७. दुविहे धम्मे पण्णत्ते, तं जहा–मुवधम्म चेव, चरित्तधम्मे ३७. धर्म दो प्रकार का कहा गया है—(१) श्रुनधर्म (द्वादशांग श्रुत का अभ्यास करना), चारित्र धर्म (सम्यक्त्व, व्रत, समिति आदि का आवरण) । सुयधम्मे दुविहे पण्णते, त जहा-सुत्तसुयधम्मे चेव, अत्य- श्रुतधर्म दो प्रकार का कहा गया है-(१) सूत्र-श्रुतधर्म सुपधम्मे वेव। (मूल सूत्रों का अध्ययन करना), (२) अर्थ-श्रुतधर्म (सूत्रों के अर्थ का अध्ययन करना)। धरित्तधम्मे दुबिहे पष्णते, तं जहा-आगारचरिसधम्मे चेव, चारित्रधर्म दो प्रकार का कहा गया हैं। (१) अगारत्तारित्र अणगारचरिसधम्म चेव । धर्म (धावकों का अणुयत आदि रूप धर्म), (२) अनगारचारित्र -ठाणं. अ०२, उ०१, सु०६१ धर्म (साधुओं का महाप्रत आदि रूप धर्म)। घेव।
SR No.090119
Book TitleCharananuyoga Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year
Total Pages782
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Conduct, Agam, Canon, H000, H010, & agam_related_other_literature
File Size23 MB
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