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________________ १४] चरणानुयोग धर्म प्रज्ञापक भगवान महावीर मूत्र १६ गंगावतक - पयाहिणावत्त - तरंगभंगुर- रविकिरण-तरुणचोहिय अकोसायंत-पउमगंभीर विधज-णाभे साहयसोणंद-मुसल-दरमणि करियवरकणगच्छर सरिसवर वइर-वलियमझे पमुद्दय बरतुरग-सोहवर-वट्टिय कही वरतुरगसुजाय-गुज्नदेसे आइण्ण-उच्च-णिरुवलेवे गयससण-सुजाय-सत्रिभोरू ससम्म-णिमग्ग-गूढ जाणु एगी फुलविदावत्त बट्टा पुस्य जंधे संठिय सुसिलिट्ट गूस गुप्फे सुपहट्ठिय-कुम्म-चार चलणे रत्तुप्पलपत्त-मस्य-सकुमाल-कोमल तले नग-नगर-मगर-सागर-चक्ककवरंग-मंगलफियपरणे उनकी नाभि मंगानदी के दक्षिणावतं तरंगों से बने हुए भंवर जैसी गुढ घुमाववाली तरुण सूर्य की किरणों से पूर्ण विकसित कमल जैसी गहन गम्भीर थी उनके शरीर का मध्यभाग तिपाई, पुसल, दर्पणदण्ड, शोधित-श्रेष्ठ स्वर्ण से निर्मित तलवार की मूठ तथा श्रेष्ठ वन के मध्यभाग जैसा था की काटि- मुदित-उत्तम अश्व तथा श्रेष्ठ सिंह की कमर जैसी थी उनका गुप्तांग श्रेष्ठ अपम जैसा सुनिष्पन था जनका मल-मूत्र-विसर्जन का स्थान उत्तम अश्व के समान लेप रहित था उनके उरू हाथी की सूध के समान सुगठित थे उनके घुटने डिब्बे के ढक्कन के समान सुस्थित थे उनकी पिण्डलियाँ हिरण की पिण्डलियों के समान तथा कुरुविन्द घास के समान क्रमशः वृत्ताकार थीं उनके टखने सुगठित, सुस्थित एवं गूड थे उनके चरण कछुए के समान ऊपर से उन्नत एवं सुप्रतिष्ठित थे उनके पैरों के तलवे रक्त उसाल जैसे मृदु सुकुमार कोमल थे उनके चरणतल में पर्वत, नगर, मकर, सागर, चक्रांक, स्वस्तिक आदि मांगलिक चिन्ह अंकित थे उनके पैरों की अंगुलियाँ क्रमशः छोटी-बड़ी एक दूसरे स सटी हुई थीं उनके पैरों की अंगुलियों के नख ताम्रवर्ण, उन्नत, स्निग्ध तथा पतले थे उनकी गति पट्टहस्ति की गति के समान पराक्रम पूर्ण थी वे स्वर्णशिला सदृश सुन्दर-रोगरहित देहधारी थे उनके शरीर पर रोमराजि सीधी, समान, एक दूसरे से मिली हुई, श्रेष्ट, सूक्ष्म, काली, चिकनी, उत्तम लावण्य-सम्पन्न एवं रमणीय थी उनका तेज मिळूम प्रज्वलित अग्नि, विद्युत, तरुण सूर्य की किरणों जैसा था ___ वे आस्रवरहित थे, ममत्व रहित थे, अपरिग्रही थे, शोक रहित थे, अलिप्त थे वे प्रेम, राग, द्वेफ स्प मोह से रहित धे वे निर्गन्ध प्रवचन के उपदेष्टा थे वे शास्त्रकारों के नायक थे, प्रतिष्ठापक थे, श्रमण स्वामी थे, श्रमण वृन्द से परिवत थे अगुपुन्च-सुमहयंगुलीए उण्णय-तणु-तंब-गिद्ध णक्खे बरवारणतुल्ल-विक्कम विलसिय गई कणसिलाय-सुजाय-णिरुबहय-देहधारी उन्जय-सम-सहिय-जच्चतणुकसिण-णिद्ध-आइज्जलउहरमणिज्जरोमराई हयवाह-णिङ्कम-जलिय तडितडिएतरुण-रविकिरण सरिस तेए अणासवे अममे अकिंचणे छिन्नसोए णिश्वलेवे बधगय-पेम-राग-दोस मोहे णिग्गं बस्स परयणस्स देसए सस्थगाइणायगे, पाहावए, समणगपई समणविद परियट्टिए
SR No.090119
Book TitleCharananuyoga Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year
Total Pages782
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Conduct, Agam, Canon, H000, H010, & agam_related_other_literature
File Size23 MB
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