SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 400
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ सूत्र५३०-५३२ उत्तरोष्ठादि रोगों के परिकर्म करवाने के प्रायश्चित्त प्रक बारित्राचार (३६७ ने भिक्खू अण्णउधिएण बा, गारस्थिएण वा अप्पगो उदु- मो भिक्षु अन्यतीथिक से या गृहस्थ से अपने होठों परसोमओयग-वियोग बा, उमिगोवग-वियोग वा, अचित्त शीत जल से या अचित्त उष्ण जल से, उच्छोलावेज्ज मा, यधोयावेज वा, धुलवावे, बार-बार धुलवावे, उच्छोलायत बा, पधोयावेत वा साइज्जइ । धुलवाने वाले का, बार-बार धुलवाने वाले का अनुमोदन करे। जे मिक्यू अण्णस्थिएण वा, गारत्यिएष वा अप्पणी उ?- जो भिक्षु अन्यतीर्थिक से या गृहस्थ से अपने होठों कोफूमावेज्ज वा, रयावेज्ज वा, रंगवावे, बार-बार रंगवाने, फूमावेतं बा, रपार्वतं वा साझज्जा । रंगवाने वाले का, बार बार रंगवाने वाले का अनुमोदन करे। तं सेवमाणे आवामह घाउम्मासियं परिहारहाणं उपाइयं । उसे चातुर्मासिक उद्घातिक परिहारस्थान (प्रायश्चित्त) --नि. उ. १५, सु ४७-५२ आता है। नत्तरोडाहमान परिवारमारामार छत्त ससाई- उत्तरोष्ठादि रोमों के परिकर्म करवाने के प्रायश्चित्त सूत्र५३१. जे भिक्खू अण्णउभिएण वा, गारस्थिएण वा अपणो बीहाई ५३१. जो भिक्ष अन्यतीथिक से या गृहस्य से अपने लम्बे उत्तउत्तरोद्वरोमाई रोष्ठ रोम (होठों के नीचे के लम्बे रोम) कापावेज वा, संठवावेज वा, कटवावे, सुशोभित करवावे, कप्यावेतं बा, संठवावेंतं वा साइक्जद। __ कटवाने वाले का, सुशोभित करवाने वाले का अनुमोदन करे। जे मिक्ल अण्णइरिथएणवा, गारस्थिएण वा अप्पणी पासा ओ भिक्षु अन्यतीधिक से या गृहस्थ से अपने नाक के लम्बे रोमाई रोमकरावेज वा संठवावेज्ज या, कटवावे, सुशोभित करवावे, कप्पावेतं या, संठवावेत या साम्रजाइ । कटवाने वाले का, सुशोभित करवाने वाले का अनुमोदन करे। त सेवमाणे आवजह चाउम्मासिवं परिहारहाणं उम्पादयं । उसे चातुर्मासिक उद्घातिक परिहारस्थान (प्रायश्चित्त) - नि. उ. १५, सु. ५३ आता है। बंतपरिकम्मकारावणस्स पायच्छित सुत्ताइ- दांतों का परिकर्म करवाने के प्रायश्चित्त सूत्र५.२. जे मिक्यू अग्णउथिएण वा, गारथिएण वा भरपणो रंतं - ५३२. जो भिक्षु अन्यतीथिक से या गृहस्थ से अपने दांतों कोआघसावेज्ज वा, पघंसावेग्ज वा, घिसमावे, बार-बार घिसवावे', आघसावेतं का, पघसावेतं का साइज्जइ । पिसवाने वाले का, बार बार पिसवाने वाले का अनुमोदन करे। से निपवू अण्णउरियएण वा, गारथिएण वा अपणो वंत- जो भिक्षु अन्यतीथिक से या गृहस्थ से अपने दांतों कोउन्छोलानबापधोयाबज्ज वा, धुलवाये, बार-बार धुलवाये, उच्छोलावेतं वा, पधोपावेत या साइजह । धुलवाने वाले का, बार-बार धुलवाने वाले का अनुमोदन जे भिक्खू अण्णउस्थिएष वा, गारथिएण वा अपणो बतफूमावेज्ज वा, त्यावेज वा, फूमावेतं ना, रयातं या साइजह । जो भिक्ष अन्यतीपिक से या गृहस्य से अपने दांतों कोरंगवावे, बार-बार रंगवावे, रंगवाने वाले का, बार-बार रंगवाने वाले का अनुमोदन करे।
SR No.090119
Book TitleCharananuyoga Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year
Total Pages782
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Conduct, Agam, Canon, H000, H010, & agam_related_other_literature
File Size23 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy