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________________ सत्र ४१६४१६ इस प्रकार के संगम चारित्राचार २८७ ८. जिम्मामएणं दुक्खेगं असंजोगेसा मवति । (८) रसनेन्द्रिय --- सम्बन्धी दुःख का संयोग नहीं करने से। ६. फरसमाओ सोक्लाओ अवबरोवेत्ता भवति । (8) स्पर्श नेन्द्रिय-सम्बन्धी सुख का वियोग नहीं करने से। १०. फासामएण चुक्खेणं असंजोगेत्ता भवति । (10) स्पर्शनेन्द्रिय--सम्बन्धी दुःख का संयोग नहीं करने से : डाणं. अ. १० सु. ७१५ वसविहे संजमे दस प्रकार के संयम४१७. सविघे संजमे पण्णते, तं जहा ४१७. संयम दश प्रकार का कहा गया है । जैसे१. पुरविकाइयसंजमे, २. उकाइपसंजमे, (१) पृथ्वी कामिक संयम, (२) अकायिक संयम, ३. तेउकास्यसंजमे, बाउकाइयसंजमे, (३) तेजस्कायिक संयम, (४) वायुकायिक संयम, ५. धणस्सतिकाइयजमे, ६. बेईदियजमे, (५) वनस्पतिकायिक संयम, (६) द्वीन्द्रिय-संयम, ७. ते इंपियसंजमे, ८. चरिदियसंजमे (७) श्रीन्द्रिम-संयम, (1) चतुरिन्द्रिय संयम, ६. चित्यिसंजमे, १०. अजीवकायसंजमे।' (६) पंचेन्द्रिय संयम, (१०) अजीवकाय-संयम । -ठाणं, अ.१०, सु. ७०६ पावसमण-सरूवं पाप श्रमण का स्वरूप४१८. सम्ममाणे पाणाणि, बीयाणी हरियाणि य। ४१८. दीन्द्रिय आदि प्राणी तथा बीज और हरियाली का मदन असंजए संजयमन्त्रमागे, पावसमणे सि वुच्चई ।। करने वाला, असंयमी होते हुए भी अपने आपको संयमी मानने -उत्त. अ. १७) गा. ६ बाला, पाप-श्रमण कहलाता है। अन्नउस्थियाणं थेरेहि सह पुढवो हिंसा विवादो अन्यतोथिकों का स्थविरों के साथ पृथ्वी हिंसा विषयक विवाद४१६. तए से अनउस्थिया ते थेरे भगवंते एवं वासी-"तुम्मे ४१६. तत्पश्चात् उन अन्यतीयिकों ने उन स्थविर भगवन्तों से गं अञ्जो ! तिविह तिबिहेणं असंजय-जाब-एर्गतबाला यावि कहा-आर्यो ! (हम' कहते हैं कि) तुम ही त्रिविध-विविध असंयत-यावत-एकान्तबाल हो। तए गं ते येरा भगवंतो से अन्नउस्थिए एवं बयासी-"कैग इस पर उन स्थविर भगवत्तों ने उन अन्यतीथिकों से (पुनः) कारणणे अम्हे तिविहं तिविहेणं असंजय-जाव-एगंतवाला पूछा-आर्यो ! किस कारण से हम त्रिविध-त्रिविध असंभल, पावि मव मो? । -यावत-एकान्तबाल हैं? तए ण से अन्नजरियया ते भेरे भगवंत एवं पयासी-"सुम्भे तब उन अन्यतीथिकों ने स्थविर भगवन्तों से यों कहाणं असो ! रीयं रीपमाणा पुढवि पेमचेह, अभिहणह, पत्तेहा "आर्यो ! तुम गमन करते हुए पृथ्वीकायिक जीवों को दबाते लेह, संघट्टह, परिताबेह, किसामेह, उवहवेह । (भाक्रान्त करते) हो. हनन करते हो, पादाभिघात करते हो, सए में तुम्मे पुतषि पन्चेमाणा-जाव-उबद्दवेमागा तिविहं उन्हें भूमि के साथ पिलष्ट (संघर्षित) करते (टकराते) हो, उन्हें तिविहेणं असंजय-जाव-एगंतबाला यावि पवइ ।" एक दूसरे के ऊपर इकट्ठे करते हो, जोर से स्पर्श करते हो. उन्हें परितापित करते हो, उन्हें मारणान्तिक कष्ट देते हो, और उपद्रवित करते-मारते हो। इस प्रकार पृथ्बीकायिक जीवों को दबाते हुए-यावत्--मारते हुए तुम त्रिविध-विविध असंयत, -याव-एकान्त बाल हो।' - -- १ चरिदिया गं जीवा असमारभमाणस्स अट्ठविहे संजमे कज्जति, तं जहा-चस्खुमाओ सोक्खाओ अववरोविता भवइ चकलुगएणं दुक्लेणं असंजोएता भवइ एवं जाव.--कासमाओ सोमवाओ अववरोवेता भवाइ फापामएणं दुखेणं असंजोगेत्ता भवद । -ठाणं. भ. ८, सु. ६१५ २ सत्तविहे संजमे पणते तं जहां-पुडविकाइयसंयमे जाव तसकाइपसंयमे, अजीवकायसंयमे । -ठाणे. भ. ७, सु. ६७१
SR No.090119
Book TitleCharananuyoga Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year
Total Pages782
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Conduct, Agam, Canon, H000, H010, & agam_related_other_literature
File Size23 MB
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