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________________ (७९) आहारक और आहारकमिश्र ये दो नहीं होते हैं । दूसरे सासादन गुणस्थानमें ५० आस्रव होते हैं-पांच मिथ्यात्व, एक आहारक और एक आहारकमिश्रयोग ये सात नहीं होते हैं । तीसरे मिश्र गुणस्थानमें ४३ आस्रव होते हैं-१४ आस्रव नहीं होते हैं:-५ मिथ्यात्व, ४ अनन्तानुबन्धी, २ आहारक और औदारिकमिश्र, वैक्रियकमिश्र, कार्माण ये तीन । चौथे अव्रत गुणस्थानमें ४६ आस्रव होते हैं- ऊपरके ४३ और अंतके ३ मिश्र मिलाकर । पांचवें देशविरति गुणस्थानमें ३७ आस्रव होते हैं । ऊपरके ४६ मेंसे ४ अप्रत्याख्यानकषाय, ४ योग, और एक त्रसवध इस तरह ९ घटा देना चाहिये । छटे प्रमत्तसंयममें २४ आस्रव होते हैं४ संज्वलन कषाय, ९ हास्यादि नोकषाय, ९ योग और २ आहारक । सातवें अप्रमत्तमें २२ होते हैं:-४ संज्वलनकषाय, ९ योग और ९ हास्यादि नोकषाय | आठवें अपूर्वकरणमें ऊपरके ही २२ आस्रव होते हैं। नववें अनिवृत्तिकरणमें १६ आस्रव होते हैं:-९ योग, ४ संज्वलन कषाय और ३ वेद । दशवें सूक्ष्मसाम्परायमें १० आस्रव होते हैं:-९ योग और १ सूक्ष्म लोभ । ग्यारहवें उपशान्नकषायमें इन्हीं ९ योगोंका आस्रव होता है, वारहवें क्षीणमोहमें भी इन्हीं ९ योगोंका आस्रव होता है और तेरहवें सयोगकेवली गुणस्थानमें ३ काययोग, २ वचनयोग, और २ मनोयोग इस तरह सातका आस्रव होता है और अन्तके चौदहवें अयोगकेवली गुणस्थानमें आस्रव सर्वथा नहीं होता है। इस तरह
SR No.090117
Book TitleCharcha Shatak
Original Sutra AuthorDyanatray
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granth Ratnakar Karyalay
Publication Year1926
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Principle
File Size9 MB
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