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________________ ( १९ ) यह अधोलोकका सब कहा, घनाकार जिनधरममैं। मति परौ नरकमैं पापकरि, रहौ सुमारग परममैं॥ १२ ॥ अर्थ - लोकके नीचे पूर्वपश्चिम चौडाई सात राजू और मध्यलोक में एक राजू कही है । इन दोनोंको मिलानेसे आठ, और आघा करनेसे चार राजू होते हैं । इनमें दक्षिण उत्तर मुटाई सात राजूका गुणा करनेसे अट्ठाइस राजू होते हैं और उनमें अधोलोककी ऊंचाई सात राजूका गुणा करनेसे १९६ राजू होते हैं । जैनधर्म में अधोलोकका सारा घनफल यही १९६ राजू कहा है । अधोलोकमें जीव पापके उदयसे उत्पन्न होता है । इससे हे भव्यप्राणियो, पाप करके नरकमें मत पडो, उत्कृष्ट सुमार्ग अर्थात् जिनधर्ममें रहो । वीतरगि मार्गकी उपासना करते रहो । ऊर्द्धलोकका घनफल | मध्यलोक इक ब्रह्म, पांच दुहुं मिले भए पट | पूरब पच्छिम दिसा, अर्ध करि तीन राजु रट ॥ दच्छिन उत्तर सात, गुणी इकईस बखानी । ऊंचे साढ़े तीन, साड़ तेहत्तर जानी ॥ १ निगोइसे लेकर मेरुपर्वतकी जड़तक अधोलोक है, जो ७ राजू ऊंचा है ।' चित्राभूमिके नीचे खरभाग, पंकभाग, सातों नरक और निगोद सब अधोलोक चा पाताललोक में गर्भित हैं । .
SR No.090117
Book TitleCharcha Shatak
Original Sutra AuthorDyanatray
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granth Ratnakar Karyalay
Publication Year1926
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Principle
File Size9 MB
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