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________________ ( १४३ ) आयु, १० देवायु, ये दश और १ दो इंद्री, २ ते इंद्री, ३ चौ इंद्रिय, ४ सूक्ष्म, ५ साधारण, ६ अपर्याप्त ये छह इस तरह १६ प्रकृतियोंको छोड़कर शेष १०४ प्रकृतियों का बन्ध होता है । नरकगतिमें एकेंद्री, स्थावर और आताप इन तीनको छोड़कर ( १०४ मेंसे ) बाकी १०१ प्रकृतियोंका बन्ध होता है । तिर्यच गतिमें तीर्थंकर और दोनों आहारक (आहारक, आहारक अंगोपांग ) इन तीनको छोड़कर ( १२० मेंसे) ११७ प्रकृतियोंका बन्ध होता है और मनुष्य गतिमें सामान्यतः एकसौ बीसों प्रकृतियोंका बन्ध होता है । इन सब प्रकृतियोंका नाश करनेसे जीव शिवस्थानी अर्थात् सिद्ध • भगवान् हो जाते हैं । समस्त जीवोंकी उत्कृष्ट आयु । मृदु भूमि बारै खर भू बाईस जल सात, वात तीन तरू कायकी दस हजार है । पंखीकी बहत्तर सहस बियालीस सांप, आगि दिन तीनि दोइंद्री वरस बार है ॥ तेइंद्री दिन उनंचास चवइंद्री छैमास, सरीसृप पूरवांग नव आव धार है । मच्छ कोर पूरव मनुष्य पसू तीनि पल्य, सागर तेतीस देव नारकीकी सार है ॥९९॥ अर्थ- मृदुभूमिकायिककी अर्थात् गेरू, हरताल आदि
SR No.090117
Book TitleCharcha Shatak
Original Sutra AuthorDyanatray
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granth Ratnakar Karyalay
Publication Year1926
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Principle
File Size9 MB
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